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सामाजिक संगठन के बूते भूमिहारों की पार्टी 40 जगहों पर फहरा सकती है भू-पताका !

bhumihar

सामाजिक संगठन के बिना भूमिहारों की पार्टी का अस्तित्व नहीं 

गौरव कुमार सिंह -
गौरव कुमार सिंह
कुछ दिन पहले मैने भूमिहारों की पार्टी की संभावनाओं और उसकी चुनौतियों पर अपनी बात रखी थी. ये उस विमर्श का ही एक हिस्सा था जिसमें भूमिहारों की नयी पार्टी की संकल्पना की गयी थी. मेरा सवाल था कि पार्टी तो बना लेंगे,लेकिन नेता कहाँ से लायेंगे? इसपर भूमिपुत्र शैलेन्द्र जी ने विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पार्टी आएगी तो नेता भी आ जाएगा. उस संदर्भ में कई तर्क भी दिए थे और संगठन का एक प्रारूप भी पेश किया था. दरअसल उनकी बात सही है कि पार्टी बनेगी तो नेता खड़ा हो जाएगा क्योंकि भूमिहार एक जिंदा कौम है जो वक़्त आने पर स्वयं जाग जाती है. बाबा ब्रह्मेश्वर और अनंत सिंह के मामले में आप देख ही चुके हैं. लेकिन मेरा मानना है कि भूमिहारों की पार्टी खडी करने से पहले एक सामाजिक संगठन को खड़ा करने की जरुरत है. एक ऐसा सामाजिक संगठन जो राजनीतिक संगठन को एक तरफ संबल प्रदान करे और दूसरी तरफ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाये. ये इसलिए जरुरी है कि बिना सामाजिक ढाँचे के बदलाव के हम भूमिहार समाज को सशक्त और समृद्ध नहीं बना सकते.इनकी अनदेखी महँगी पड़ सकती है. 

भूमिहार ब्राहमण समाज की सामाजिक बुराइयां - 

दहेज़ प्रथा – दहेज़ प्रथा भूमिहार समाज के लिए एक कोढ़ की तरह है. इसकी वजह से घर-के-घर तबाह हो गए.इसने हमारी जितनी लुटिया डुबाई, उतनी तो लालू भी नहीं डूबा सके. दहेज़ को भूमिहार समाज में स्टैटस सिम्बल बना दिया गया है. यह वाकई में एक खतरनाक स्थिति है.यदि हम अब भी नहीं संभले तो हमारा भगवान ही मालिक है. एक माध्यम आयवर्ग के भूमिहार परिवार में शादी का खर्चा कम-से-कम 15 लाख के करीब हो गया है. सोंचिये इस रकम को लाने के लिए कितनी मश्क्क्कत करनी पड़ती होगी. इस चक्कर में भूमिपति – भूमिहीन में बदल रहे हैं. ज़मीन बेचकर बेटी की शादी कर रहे हैं और भूमिहारों की भू-शक्ति कम होती जा रही है. कहने का अभिप्राय है कि ये समाज को दीमक की तरह चाट रहा है और इससे समाज की खुशहाली भी छीन रही है. 

शिक्षा : दूसरा अहम मुद्दा शिक्षा का है. दरअसल शिक्षा पर ही समाज की पूरी बुनियाद टिकी हुई है.इसलिए इसपर समाज को बहुत अधिक ध्यान देने की जरुरत है. करियर काउंसिलिंग जैसे कार्यक्रम लगातार होते रहे. उसके अलावा गाँव में लाइब्रेरी खोलकर भी शिक्षा का दीया हम जला सकते हैं. मेरे हिसाब से तुरंत-फुरंत में ये सबसे प्रॉफिटेबल इन्वेस्टमेंट होगा.इससे भूमिहार ब्राहमण समाज के युवाओं को अपने आप को एक्सप्लोर करने का ज्यादा मौका मिलेगा. लाइब्रेरी बनाने के लिए गाँव के लोगों से चंदा एकत्रित करके भी शुरुआत की जा सकती है. इससे पढाई का माहौल बनेगा. हमें मारवाड़ी समाज से सीख लेनी चाहिए. देश में आज के तारीख में सबसे आगे मारवाड़ी है क्योंकि देश के अर्थ पर उसकी पकड़ है.उसके घर में पढ़ाई एक संस्कार है.आप नजर उठा के देख लें आपको 80 % सी ए और दूसरे कॉमर्स प्रोफेशनल क्षेत्र में या तो मारवाड़ी है या जैन. एवरेज मिडिल क्लास घर के बच्चे इसको अफ़्फोर्ड कर सकते है और इसमें आरक्षण का रोना भी नहीं है,थोड़ा कठिन है परन्तु जितना एफर्ट सब बैंक पीओ के जॉब के लिए करते है उतने में ये भी हो जायेगा. लाइब्रेरी वाले मुद्दे पर विशेष गंभीरता से विचार करने की जरुरत है. 

शिक्षा से राजनीति में जलेगा उम्मीद का दीया : 

शिक्षा हमारे समाज के प्रत्येक नेतृत्व शून्यता को भरेगा चाहे वो राजनीतिक क्षेत्र में हो या प्रशासनिक या उद्यमशीलता के क्षेत्र में। वैसे मैं राजनीतिक पार्टी वाले विमर्श को नकार नहीं रहा हूँ बल्कि मैं उन मुद्दों को भी ध्यान में लाने की कोशिश कर रहा हूँ जो छूट रहे है। राजनीतिक पार्टी का जहाँ तक सवाल है तो मैं कुछ दिन पहले मैंने साथियों से भूमिहार बहुल इलाको का विवरण माँगा तो पता चला कि करीब 40 सीटों पर हम जोड़-तोड़ कर के जीत सकते है जो कि बिहार के राजनीति में खुद को प्रासंगिक साबित करने के लिए काफी है. बाकि जगह समीकरण के हिसाब से फैसला लिया जा सकता है। जारी..... (इस विषय पर आपके विचार भी आमंत्रित है)

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