Skip to main content

बाभनों की पार्टी तो बना लोगे, नेता कहां से लाओगे बाबूजी!

कुशल नेतृत्व के अभाव में भूमिहारों की पार्टी की नैय्या कैसे पार होगी?

bhumihar

भूमिहार पार्टी तो बना लेंगे, नेता कहाँ से लायेंगे?

भू-मंत्र डॉट कॉम पर भूमिपुत्र शैलेन्द्र के लेख से पिछले दिनों एक विमर्श शुरू हुआ. विमर्श का विषय बना भूमिहारों की अपनी राजनीतिक पार्टी. शैलेन्द्र ने अपने लेख में लिखा कि भूमिहार ब्राहमणों को राजनीति में जिस तरीके से हाशिये पर धकेला जा रहा है, उसमें जरुरी है कि समाज अपनी खुद की पार्टी का गठन करे और जीतने के लिए न सही तो कम - से - कम अपना वजूद बताने के लिए चुनाव में ताल ठोके. इसपर भूमिहार ब्राहमण समाज की तरफ से जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली या यूं कहे कि किसी ने समाज की दबी आकांक्षा को शब्द दे दिए. हालाँकि इसके विरोध में कुछ लोगों ने अपने तर्क रखे, जिसमें से कुछ तर्कसंगत भी जान पड़ते हैं. बहरहाल जबर्दस्त विमर्श हुआ और उसका दौर अब भी जारी है. इसी मुद्दे पर भूमिपुत्र गौरव कुमार सिंह ने भी एक वाजिब मुद्दा उठाया है. वे भूमिहारों की पार्टी बनाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनकी चिंता है कि इस पार्टी को ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए करिश्माई नेता कहाँ से आएगा. पढ़िए उनका विश्लेषण - 

gaurav kumar singh
गौरव कुमार सिंह

विमर्श सही,लेकिन भूमिहारों की पार्टी का नेता कौन होगा?

विगत कुछ दिन से अपने समाज में अपनी पार्टी बनाने को लेकर विमर्श चल रहा है। यह विचार बुरा नहीं है,परंतु सबसे बड़ा सवाल है कि पार्टी का नेता कौन होगा और उसके मुद्दे क्या होंगे? समीकरणों का गणित उसके पास क्या होगा? क्योंकि ये तो तय है कि भूमिहार ब्राहमण समाज अकेले अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकता. उसके लिए जोड़-तोड़ और समीकरण की राजनीति करनी ही पड़ेगी. बहरहाल ये नौबत भी तब आएगी जब एकमुश्त भूमिहार समाज उस पार्टी के पीछे लामबंद हो और उसके लिए ऐसा नेतृत्व चाहिए। क्या आज के तारीख में ऐसा कोई भूमिहार नेता है जो अपने पार्टी लाइन से इतर जाके राजनीति कर सके या जिसका सम्पूर्ण बिहार के भूमिहार में अपील है। 

भाजपा और आरआरएस की तर्ज पर तानाबाना बुनने की जरुरत

सीपी ठाकुर और मनोज सिन्हा जैसे कुछेक नेता हैं जो भूमिहारों की राजनीति को दिशा प्रदान कर सकते हैं लेकिन वे अकेले क्या करेंगे ? जहाँ तक सवाल सीपी ठाकुर का है तो वैसे भी वे राजनीति में अब हाशिये पर जा रहे हैं और इसके लिए जिस उर्जा की आवश्यकता है, उसकी अपेक्षा करना भी उनसे अब बेमानी है . इसलिए हमें जरूरत है, पंचायत स्तर से युवाओं की एक ऐसी पौध खड़ी करने की, जो एक सीपी ठाकुर या मनोज सिन्हा के पीछे चट्टान की भाँति खड़ा हो जाये। चाहे वो मनोज सिन्हा या सी पी ठाकुर किसी पार्टी का हो। अब सवाल है कि ऐसे युवाओं की पौध आये कहाँ से? जरा सा आउट ऑफ़ बॉक्स सोचे तो जवाब एकदम स्पष्ट और शीशे की तरफ साफ़ है। बीजेपी और आरएसएस का कॉन्फ़िगरेशन देखें। एक सामाजिक संग़ठन है और एक राजनीतिक। राजनीतिक पार्टी को सामाजिक संग़ठन से खाद पानी मिलता है। भाजपा को जो भी जरूरत होती है आपूर्ति आरएसएस से होती है। कुछ ऐसा ही तानाबाना हमें भी बुनना पड़ेगा. 

युवाओं को कैसे जोड़े ?

रही बात कि युवाओं के कैसे जोड़ा जाए और उनकी पौध कैसे खड़ी की जाए. इसके लिए हमे राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक संगठन की जरूरत है,जस्ट लाइक ऑक्सीजन। समाज के गणमान्य और प्रभावशाली लोग मिलकर एक जेनयून सामाजिक संगठन खड़ा करे जो निरंतर सामाजिक मुद्दे पर काम करे। मसलन शराबबंदी,शिक्षा,दहेज़ प्रथा आदि के खिलाफ समाज में जागरूकता फैलाये, तभी राजनीतिक दल की रणनीति कारगर होगी. नहीं तो हालात सुधरने की बजाये और बिगड़ेंगे ही. इसलिए मुकम्मल तैयारी जरुरी है. 
 (कृपया आप भी अपनी राय देकर इस विमर्श को आगे बढ़ाएं.)

Community Journalism With Courage

ज़मीन से ज़मीन की बात 

भू-मंत्र

Comments

Popular posts from this blog

अंतर्जातीय विवाह की त्रासदी सुहैब इलियासी-अंजू मर्डर केस, सच्चाई जानेंगे तो चौंक जायेंगे

पत्नी अंजू की हत्या के मामले में सुहैब इलियासी दोषी,मिली उम्रकैद की सजा  खुलेपन के नाम पर अंतर्जातीय विवाह आम बात है. भूमिहार समाज भी इससे अछूता नहीं. लड़के और लड़कियां आधुनिकीकरण के नाम पर धर्म और जाति की दीवार को गिराकर अंतर्जातीय विवाह कर रहे हैं. लेकिन नासमझी और हड़बड़ी में की गयी ऐसी शादियों का हश्र कई बार बहुत भयानक होता है. उसी की बानगी पेश करता है अंजू मर्डर केस जिसमें 17साल के बाद कोर्ट का फैसला आया है और अंजू के पति सुहैब इलियासी को उम्र कैद की सजा का हुक्म कोर्ट ने दिया है. गौरतलब है कि अंजू इलियासी कभी अंजू सिंह हुआ करती थी और एक प्रतिष्ठित भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती थी.
सुहैब इलियासी और अंजू की कहानी - अंजू की मां रुकमा सिंह के मुताबिक़ सुहैब और अंजू की पहली मुलाकात 1989 में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई थी. धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए और बात शादी तक जा पहुंची. अंजू के पिता डॉ. केपी सिंह को जब इस रिश्ते का पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया. लेकिन इसके बावजूद अंजू और सुहैब ने 1993 में लंदन जाकर स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी कर ली. इसके बाद अं…

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…