Skip to main content

‘हनुमान’ जी की तरह अपनी शक्तियां क्या भूल गया ‘भूमिहार ब्राहमण समाज’?

कभी नौकर-चाकर रखने वाले भूमिहार ब्राहमण आज खुद नौकरी के लिये तरस रहे है

bhumihar brahamin

समय बदलता रहा है. सबल-निर्बल हो जाता है और निर्बल-सबल. पिछले कई दशकों के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों और अलग-अलग समुदायों के षड्यंत्र में फंसकर 'भूमिहार ब्राहमण समाज' की कुछ ऐसी ही दशा हो गयी है.राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में व्यक्तिगत उपलब्धियों को छोड़ दे तो सामूहिक रूप से समाज हाशिए पर खड़ा है और उसके उभरने की कोई संभावना भी नहीं दिख रही. ऐसे में समाज क्या करे और क्या न करे जिससे हम अपने पुराने गौरव को हासिल कर फिर से महाशक्ति बन सके. लेखक 'शैलेन्द्र कुमार' का विश्लेषण - (परशुराम)


सुनहरा इतिहास : तारकेश्वरी सिंहा

तारकेश्वरी सिंहा बिहार की राजनीति को अपने ईद- गिर्द घुमाने वाले, भारत की स्वतंत्रता मे अहम भूमिका निभाने तथा कई क्रांतिकारियों सहित अनेको स्वतंत्रता सेनानी देने वाले, इंदिरा गाँधी जैसे प्रधान मंत्री को टक्कर देने वाली अपने समाज की महिला तारकेश्वरी सिंहा को कौन भूला सकता है. 

शिक्षा और नौकरी के लिए तरसता समाज : 

लेकिन बिहार को विकसित करने वाले ‘भूमिहार ब्राह्मण’ आज खुद अपने विकास के लिये संघर्ष कर रहे हैं. गांवों में अपने जमीन पर अपने पैसो से स्कूल बनवाकर गांव को शिक्षित करने वाले भूमिहार ब्राह्मण के बच्चे आज खुद शिक्षा के लिये तरस रहे है. हालत ये है कि कभी नौकर चाकर रखने वाले भूमिहार आज खुद नौकरी के लिये तरस रहे है? आखिर क्यों? क्या सभी सोचा है? 

भूमिहार का लठैत भूमिहार पर ही लठ्ठ चलाने लगा : 

हालात ये है कि जो कभी भूमिहार का लठैत हुआ करता था आज वो भूमिहार पर ही लठ चलाने लगा है. आखिर क्यो? क्यों हमलोग हर क्षेत्र मे पिछड़ रहे है? इसका सीधा कारण है हनुमान जी तो श्राप के कारण अपनी, शक्ति भूल बैठे थे और हमलोग अपने अहंकार के कारण अपनी, शक्तियाँ भूल नही रहे बल्कि खो रहे हैं. 

झूठी शान ने पतन की राह पर खड़ा कर दिया : 

भूमिहार ही वो जाति है जो अपने बेटे के शादी मे भी 5 कट्ठा जमीन बेच देता है अपना शान दिखाने मे. यही कारण है कि हम सभी जातियो मे श्रेष्ठ होते हुए औरो से अधिक बुद्धिजीवी होते हुए रावण की तरह अहंकारी है जो अपने झूठी शान और अहंकार के कारण लगातार पतन की ओर जा रहे है. 

शक्तियां याद कराने कोई जामवंत नहीं आएगा : 

अब भी अगर हम इन कुरीतियों को छोड़कर अपनी शक्ति को नही पहचाने तो हमें हमारी शक्ति का एहसास कराने कोई जामवंत नहीं आयेगा. हमे खुद संगठित, शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न होकर फिर से महाशक्ति बनना होना. 

बच्चों को रूचि के हिसाब से काम करने की छूट दीजिए : 

हमें अपने बच्चों के गुणों को पहचान कर उसे उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाने की दिशा में प्रयासरत रहने की जरूरत है. पढ़ने मे रूचि है तो 5 कट्ठा जमीन बेचकर भी पढ़ाईये. रूचि के हिसाब से करियर बनाने का मौका दिजीये. यदि पढाई से ज्यादा व्यवसाय में रूचि तो व्यवसाय करने दीजिये. यदि खेलने में रूचि है तो खेलने दीजिये. 

संगठन और शिक्षा से ही फिर बनेंगे महाशक्ति : 

कहने का अभिप्राय है कि बच्चों पर ध्यान रखिये, अच्छे संस्कार और अच्छी परवरिश दीजिये ताकि वो आवारा या अपराधी न बने. क्योंकि जब तक हम संगठित होकर शैक्षिक और आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होंगे तब तक फिर से राजनीति के गलियारों में फिर से महाशक्ति नहीं बन सकते. 

 (लेखक “शैलेन्द्र कुमार” के विचार) 
यदि इस मुद्दे पर आपकी भी कोई राय है तो हमें bhumantra@gmail.com पर भेजें.

Community Journalism With Courage

ज़मीन से ज़मीन की बात 

(भू-मंत्र की वैचारिक लड़ाई में सहभागी बने. लेख लिखकर सहयोग प्रदान करे.अपने लेख हमें bhumantra@gmail.com पर भेजें.)

Comments

Popular posts from this blog

अंतर्जातीय विवाह की त्रासदी सुहैब इलियासी-अंजू मर्डर केस, सच्चाई जानेंगे तो चौंक जायेंगे

पत्नी अंजू की हत्या के मामले में सुहैब इलियासी दोषी,मिली उम्रकैद की सजा  खुलेपन के नाम पर अंतर्जातीय विवाह आम बात है. भूमिहार समाज भी इससे अछूता नहीं. लड़के और लड़कियां आधुनिकीकरण के नाम पर धर्म और जाति की दीवार को गिराकर अंतर्जातीय विवाह कर रहे हैं. लेकिन नासमझी और हड़बड़ी में की गयी ऐसी शादियों का हश्र कई बार बहुत भयानक होता है. उसी की बानगी पेश करता है अंजू मर्डर केस जिसमें 17साल के बाद कोर्ट का फैसला आया है और अंजू के पति सुहैब इलियासी को उम्र कैद की सजा का हुक्म कोर्ट ने दिया है. गौरतलब है कि अंजू इलियासी कभी अंजू सिंह हुआ करती थी और एक प्रतिष्ठित भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती थी.
सुहैब इलियासी और अंजू की कहानी - अंजू की मां रुकमा सिंह के मुताबिक़ सुहैब और अंजू की पहली मुलाकात 1989 में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई थी. धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए और बात शादी तक जा पहुंची. अंजू के पिता डॉ. केपी सिंह को जब इस रिश्ते का पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया. लेकिन इसके बावजूद अंजू और सुहैब ने 1993 में लंदन जाकर स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी कर ली. इसके बाद अं…

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…