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पार्टी दफ्तर में लिखी गयी थी 'ऑपरेशन भूमिहार' की पटकथा




2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात से एक लहर चली और उस लहर में यूपी-बिहार सब बह गए. इस लहर के जो साथ चला,उसका बेड़ा पार हो गया और जो खिलाफ गया, उसका सफाया हो गया. समर्थकों ने इसे मोदी लहर का नाम दिया. इस लहर ने यूपी - बिहार में कुछ इस कदर विरोधियों पर कहर बरपाया कि यूपी के 80 सीटों में से 73 सीटों पर तो दूसरी तरफ बिहार के 40 सीटों में से 31 सीटों पर भाजपा गठबंधन ने कब्ज़ा कर विरोधियों को सकते में डाल दिया. ऐसे में बिहार में लालू यादव और नीतिश कुमार दोनों को अपनी राजनीति की नैय्या डूबती नज़र आने लगी.

गौरतलब है कि भाजपा ने जैसे ही नरेंद्र मोदी को पार्टी की तरफ से पीएम पद के लिए प्रत्याशी घोषित किया, वैसे ही नीतिश कुमार ने जदयू और भाजपा गठबंधन तोड़ लिया. लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन और भाजपा के हाथों मिली करारी शिकस्त से नीतीश इस कदर हिल गए कि धुर विरोधी लालू यादव के साथ जाकर हाथ मिला लिया. लालू यादव तो इसी मौके की ताक में थे ही क्योंकि उन्हें पता था कि अकेले दम पर अबकी बार अपना अस्तित्व बचाना भी मुश्किल काम होगा, जीत तो दूर की कौड़ी है.फिर जुगाड़बाजी की इस राजनीति की तिकडमबाजी की शुरुआत हुई तो सबसे पहले दोनों को सबसे बड़े रोड़े के रूप में भूमिहार ही दिखे. लेकिन साथ ही उन्हें अपने दर्दे दिल का सबसे बड़ा उपचार भी 'भूमिहार' जाति में ही दिखा. इसलिए यादव वोटों के ध्रुवीकरण करने के लिए एक षड्यंत्र रचा गया, जिसका नाम दिया गया 'ऑपरेशन भूमिहार' और मोहरा बना एबीपी न्यूज़.


सूत्र बताते हैं कि इस षड्यंत्र की पटकथा दिल्ली में एक राजनीतिक पार्टी के दफ्तर में तैयार की गयी. किस पार्टी के दफ्तर में तो उसका आप सहज अंदाज़ लगा सकते हैं. बाकायदा इसपर गोपनीय तरीके से कई राउंड की मीटिंग हुई. फिर पटकथा लिखी गई और अंततः मोल-तोल के बाद खबर का ठेका एबीपी न्यूज़ को दे दिया गया. हालाँकि इस रेस में कई और चैनल भी थे, लेकिन रकम और शर्तों को लेकर वहां बात बनी नहीं. आपको पता ही है कि चारा घोटाले का चोर कितना कंजूस है. हजारों करोड़ होने के बावजूद उस राजनेता को पैसे खर्चने में बहुत दर्द होता है. उसका बस चले तो वो पैसे का काम भी जुबान से ही कर ले.

ख़ैर एबीपी न्यूज़ ने इस ठेके को अंजाम तक पहुँचाने के लिए बिहार की राजनीति से अनभिज्ञ और चॉकलेटी रिपोर्टर/एंकर अभिसार शर्मा को ज़िम्मा सौंपा, जिसे अभिसार ने वफादारी से निभाया भी. खास बात ये रही कि इस मसले को पूरी तरह से गोपनीय रखा गया. अभिसार के साथ जो कैमरामैन भेजा गया, उसकी भी जाति देखी गयी और इसी वजह से खासतौर से एक यादव को अभिसार के साथ भेजा गया. ताकि खबर की मंशा कहीं लीक न हो जाए. उससे पूरा मामला चौपट हो सकता था. संपादक के रूप में शाजी ज़मा तो थे ही.

इलाके का चयन भी बड़ी सूझबूझ से किया गया. एक ऐसा इलाका चुना गया जहाँ दबंग की भूमिका में कोई भूमिहार हो और दीन-हीन की हालत में दूसरों के साथ-साथ यादव भी हो. यदि टीवी पर ये बात स्टैब्लिश हो जाए कि भूमिहारों ने यादवों के साथ दबंगई की है तो उसके प्रतिरोध में पूरे बिहार के यादव लामबंद हो जाएंगे और राजद/जदयू गठबंधन की जीत की संभावना प्रबल हो जायेगी.  भूमिहार वोट से तो वे पहले से ही निश्चिंत थे कि इनका  वोट किसी हाल में इन्हें नहीं मिलने वाला है. सब भाजपा के खाते में जाएगा. यही वजह रही कि लालू यादव की पार्टी राजद ने एक भी भूमिहार को टिकट तक नहीं दिया. हालाँकि जिस व्यूह रचना के हिसाब से 'ऑपरेशन भूमिहार' रचा गया था वो भाजपा की नासमझी की वजह से फलीभूत भी हुआ. लेकिन इस चक्कर में जबरन भूमिहार जाति को बदनाम करने की साजिश रची गयी जिसे दिखाया तो एबीपी न्यूज़ ने था लेकिन उसकी पटकथा राजनैतिक दल के पार्टी ऑफिस में तैयार की गयी थी.

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