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लालू यादव के भी गुरुदेव हैं अरविंद केजरीवाल



लालू यादव के अपने राजनीतिक फंडे है और उसमें उन्हें महारत हासिल है. कब किसका साथ छोड़ना है और कब गले मिलना है उन्हें बखूबी आता है. उनके राजनैतिक सफरनामे पर दृष्टि डालियेगा तो ऐसे कई उदाहरण पाइएगा. दूर जाने की क्या जरूरत है, वर्तमान गठबंधन सरकार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. लालू यादव और नीतिश कुमार में विवादों के बाद लठ्ठबंधन हुआ और जब मोदी लहर से आक्रांत हुए तो लालू यादव ने नीतिश का हाथ थामने में देर नहीं लगायी. विश्वस्त सूत्रों की माने तो लालू की तरफ से ही पहले हाथ बढ़ाया गया और गले लगाने में तो वे माहिर है ही. लेकिन इस मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल उनसे भी बड़े गुरुघंटाल है. वे भी काम खत्म, आदमी खत्म की धारणा पर चलते हैं. अपने छोटे से राजनैतिक करियर में ही उन्होंने कितनों को गले लगाया और फिर झटक दिया.---


लालू यादव को भी उन्होंने इसका ट्रेलर तब दिखाया जब गठबंधन की सरकार में बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ नीतिश कुमार ले रहे थे. उस वक्त देश भर के तमाम भाजपा/मोदी विरोधी नेताओं को शिरकत का न्योता दिया गया था. उसी न्योते पर अरविंद केजरीवाल भी समारोह में शिरकत करने गए. वहां लालू यादव ने स्टेज पर केजरीवाल को गले लगाया और ये तस्वीर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गयी.

केजरीवाल के समर्थक भी इस तस्वीर से आहत हुए कि भ्रष्टाचार की खिलाफत में पैदा हुई पार्टी का मुखिया चारा घोटाले के आरोपी लालू से गलबहियां कर रहा हैं. क्योंकि राजनीति में गले मिलने का मतलब सिर्फ गले मिलना नहीं होता है, इसका एक बड़ा सांकेतिक मतलब भी होता है. खुद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारणी में भी सवाल उठा. अपने को घिरता देख दिल्ली में आते ही केजरीवाल ने गले मिलन पर पानी फेरते हुए, उसका सारा श्रेय लालू यादव पर थोप दिया.

केजरीवाल ने कहा कि लालू यादव जबरन उनके गले पड़ गए. उन्होंने हाथ मिलाया तो लालू ने उनको खींचकर जबरन उन्हें गले लगाया. इस तरह केजरीवाल ने इस मुसीबत से अपना पीछा छुड़ाया और इस चक्कर में लालू यादव की फजीहत हो गयी.इसलिए तो हम कहते हैं कि लालू यादव के भी गुरुदेव हैं अरविंद केजरीवाल.अपने राजनैतिक जीवन में लालू यादव को गले लगाने पर ऐसा झटका आजतक किसी ने नहीं दिया था. आमतौर पर गले लगाकर वही झटका अबतक देते आए हैं. लेकिन पहली बार उन्हें झटका लगा और क्या जोर का झटका लगा. लगे भी क्यों नहीं, ऐसे ही नाम नहीं पड़ा है AK47. 

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ज़मीन से ज़मीन की बात 

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