Skip to main content

जीतन राम मांझी के भरोसे अब पथरा इंग्लिश के भूमिहार



इंग्लिश पथरा गाँव में जो मानवाधिकार का उल्लंघन हुआ,उसपर इस खबर से मरहम लगा कि मामला मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा है और शायद सुनवाई के बाद आयोग मामले की सुध लेकर इस दिशा में कुछ रिपोर्ट जारी करे जिससे बिहार सरकार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दवाब बने. 

अखिल भारतीय भूमिहार ब्राहमण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ये जानकारी देते हुए फेसबुक पर लिखा - "6 दिसम्बर 2016 को पटना जा रहा हूँ, 7 दिसम्बर को अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासंघ के प्रतिनिधि मंडल के साथ नवादा जाना है । 8 दिसम्बर 2016 को बिहार मानवाधिकार आयोग पटना के कोर्ट में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना है।" 

ये जानकर भू-समाज से जुड़े हर व्यक्ति को प्रसन्नता हुई. लेकिन आज अचानक जो तस्वीर और खबर सोशल मीडिया पर आयी है उसमें अचानक से इंग्लिश पथरा के उद्धारक के रूप में दलित नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अवतरित हो गए.तस्वीर शेयर करते हुए अखिल भारतीय भूमिहार ब्राहमण महासभा के मनीष शेखर ने लिखा - "बिहार मानव अधिकार आयोग पटना के समक्ष नवादा पथरा गांव के पीडित लोगों को न्याय दिलाने के लिए पक्ष रखा उसके बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री जीतन राम मांझी जी के साथ उनके आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। मैं श्री जीतन राम मांझी जी को धन्यवाद देता हुं जिन्होंने हमारे साथ बिहार सरकार के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है।"  

जीतन राम मांझी ने समर्थन दिया, ये अच्छी बात है. लेकिन तस्वीर देखकर मामला समर्थन तक नहीं मालूम पड़ता.राजनीति की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला भली-भांति इस समर्थन और मांझी की पार्टी के बैनर तले इंग्लिश पथरा पर हुए प्रेस कॉंफ्रेंस का मतलब समझ सकता है. 

भू-मंत्र का सीधा सा सवाल है कि जब अखिल भारतीय भूमिहार ब्राहमण महासभा के बैनर तले इंग्लिश पथरा के मामले को मानवाधिकार आयोग में ले जाया गया तब ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि अचानक से बैनर बदलकर मांझी की पार्टी 'हम' के बैनर तले प्रेस कॉंफ्रेंस की गयी और जीतन राम मांझी को इंग्लिश पथरा के उद्धारक के रूप में पेश किया गया?

कहने का मतलब है कि जीतन राम मांझी के भरोसे अब इंग्लिश पथरा के भूमिहार रहेंगे. यानी एक दलित नेता करेगा सवर्ण भूमिहारों का बेड़ा पार. गौरतलब है कि अपने मुख्यमंत्री काल में जीतन राम मांझी ने अपनी ओछी राजनीति के लिए सवर्णों को क्या कुछ नहीं कहा. 

वैसे आपको बताते चले कि सात तारीख यानी एक दिन पहले ही वे भू-विरोधी लालू यादव से मिलकर आए हैं जिसकी बिहार के राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है.यानी इंग्लिश पथरा के मास्टर माइंड ही अब अखिल भारतीय भूमिहार महासभा के सहयोग से इंग्लिश पथरा को न्याय दिलाएंगे. वाह रे न्याय की राजनीति. ख़ैर जाते-जाते वही पुराना शेर - "गैरों में कहाँ दम था, हमें तो अपनों ने लूटा." बाकी तो आप खुद ही समझदार है.

ज़मीन से ज़मीन की बात - भू-मंत्र

Comments

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

भाजपा के भरोसे कब तक रहेंगे भूमिहार,बनाते क्यों नहीं अपनी पार्टी?

एक ज़माना पहले भूमिहार समाज और बिहार की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन फिर एक आंधी आयी और उसमें सबकुछ उड़ता चला गया.जब गुबार छंटा तो भूमिहार ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे. जानिये 'शैलेन्द्र' की जुबानी पूरी कहानी (परशुराम)
1977 तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व - भूमिहार समाज आज राजनीति में हाशिये पर है.लेकिन एक वक़्त था जब भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीति में तूती बोलती थी.भारत की आज़ादी के बाद बिहार जैसे प्रदेश में तो पूरी राजनीति ही भूमिहारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही . यही वजह रही कि बिहार की राजनीति में 1977 तक श्रीकृष्ण बाबू के रूप में सिर्फ एक मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भूमिहार विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रही. 
भूमिहारों ने की ऐतिहासिक भूल - लेकिन 1977 के बाद से स्थितियां बदलने लगी. बिहार की राजनीति बदलने लगी. भूमिहारों के खिलाफ कई दूसरी जातियां लामबंद होने लगी.फिर भी भूमिहार विधायकों की संख्या में कोई ख़ास कमी नहीं आयी. लेकिन इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी सियासत का रूख पलट दिया. भू-समाज ने एक ऐतिहासिक गलती की. 1992 में कांग्रेस को …