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बंदर के हाथ में बिहार,फिर एक बार!



-रणवीर सिंह उर्फ रणवीर कसाई -

परशुराम की बिहार डायरी : बिहार में लालू यादव का शासनकाल अपने चरमोत्कर्ष पर था.सत्ता की सरपरस्ती में अपराध और अपहरण का व्यवसाय सबसे ज्यादा मुनाफे का व्यवसाय बन चुका था.अपराधियों के हौसले बुलंद थे और पूरा प्रांत त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा था.आमजन को छोडिये, स्थानीय पत्रकार तक ख़बरें करने से डरते थे क्योंकि खिलाफ में खबर करने का मतलब सिर्फ मौत और मौत थी.इसलिए ज्यादातर पत्रकार चारण में लगे थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री अपने चिरपरिचित अंदाज़ में उन्हें दुरदुराते रहते थे.लेकिन इसी माहौल में एक ऐसी निर्भीक,बेबाक और विचारोत्तेजक पत्रिका आयी जिसने अच्छों - अच्छों की खटिया खड़ी कर दी.इस पत्रिका का नाम 'विचार मीमांसा' था और इसके एक लेख ने बिहार की तत्कालीन राजनीति पर ऐसा व्यंग्य किया कि सत्तासीन पूरा कुनबा लेख लिखने वाले पत्रकार की जान लेने पर उतारू हो गया.विचार मीमांसा पत्रिका के पत्रकार का नाम 'अखिलेश अखिल' था.इन्होने सीधे-सीधे लालू यादव को आईना दिखाते हुए लेख लिखा और उसका शीर्षक दिया - "बंदर के हाथ में बिहार".उस वक्त ही लालू यादव की चारा घोटाला प्रकाश में आया था. शीर्षक देख कर ही तत्कालीन सरकार की चूल हिल गयी.फिर क्या था अखिलेश अखिल के पीछे प्रशासन से लेकर राष्ट्रीय जनता दल की पूरी फ़ौज छोड़ दी गयी.लेख से आहत सत्तारूढ़ दल पत्रकार और पत्रिका के संपादक की खून की प्यासी हो गयी क्योंकि सच सुनने की उनकी आदत तो थी नहीं.लेकिन आईने में किसी ने उनके कर्मों का बदसूरत चेहरा दिखा दिया तो बुरी तरह आहत हो गए.फिर क्या था, लालू समर्थकों ने अखिलेश अखिल पर हमला कर दिया,जिसमें वे बुरी तरह घायल हो गये थे.बाद में उन्हें अपनी जान की सलामती के लिए बिहार से पलायन करना पड़ा.


बहरहाल फिर नीतिश कुमार की अगुवाई में बिहार का राजनीतिक माहौल बदला और बंदर के हाथ से बिहार निकलकर सुशासन बाबू के हाथ में पहुंचा और अगले दस साल तक तमाम बंदर सत्ता के गलियारों से दूर रहे.वे हाशिए पर पहुँच गए और उनका दम बस निकलने ही वाला था कि खुद सुशासन बाबू ने बिहार की जनता से दगाबाजी करते हुए बंदरों का हाथ थाम कर सत्ता की कुंजी उनके हाथ पकड़ा दी और एक बार फिर बंदर के हाथ में बिहार आ गया और जल्द ही उसका परिणाम भी दिखने लग गया.सत्ता की गाड़ी के आगे आने वाले मासूम लोग फिर सड़कों पर कुचले जाने लगे.भागलपुर में भूमिहीन महिलाओं को बेरहमी से पीटा जाने लगा. शहाबुद्दीन की जेल में मंत्री(राजद का) से मुलाकात की तस्वीर लेने पर हिन्दुस्तान के पत्रकार को गोलियों से छलनी कर दिया गया. शहाबुद्दीन जैसे दहशत के नुमाइंदे जेल से बाहर आने के लिए तड़फड़ाने लगे.लगभग आज़ाद भी हो गया था,लेकिन सोशल मीडिया के असर से फिर उसकी जेलबंदी हुई.आठवीं और नवी पास अयोग्य लोग बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री और मंत्री बन गए.अपराधी सक्रिय हो गए.अपहरण फिर से होने लगे.पथरा इंग्लिश जैसे गाँवों में सत्ता के इशारों पर ग्रामीणों से मतदान का अधिकार तक छीना जाने लगा.राज्य के व्यापारी फिर दहशत में आ गए.एक ही साल में हाहाकार मच गया.दो पूर्व मुख्यमंत्री में से एक मोदी से लड़ने में व्यस्त हैं तो दूसरा नीतिश कुमार की शादी की अगुवाई में लगी है और वर्तमान मुख्यमंत्री इन दो पूर्व मुख्यमंत्री और उनके कुनबे से निपटने में ही व्यस्त है.फिर बिहार की किसको चिंता,उसका रसातल में जाना तय है क्योंकि एक बार फिर बंदर के हाथ में बिहार है.  (नोट- 'बंदर' शब्द का यहाँ साहित्यिक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.वैसे भी बंदर इंसानों के पूर्वज हैं और यहाँ इसका इस्तेमाल पीछे ले जाने के संदर्भ में किया गया.)
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