Skip to main content

अनंत सिंह से भयभीत लालू यादव की नीतिश कुमार से डील !




लालू यादव और उनका पूरा कुनबा अपनी लंठई के लिए जाना जाता है.लेकिन कहते हैं न कि शेर को कभी न कभी सवा शेर मिल ही जाता है.लालू यादव को भी इस मामले में उनका गुरु मिल गया.गुरु ऐसा जो सिर्फ मुंह से ही नहीं लात-हाथ से थपरियाने-लतियाने में भी यकीन करता है.शरीर भी ऐसा भीमकाय कि देखकर लालू जैसों का खून सूख जाए.दुनिया के लिए वो बाहुबली है लेकिन टाल क्षेत्र के किसानों का वो मसीहा है.उसके शौक निराले हैं, वो लालू के घोड़े का खरीददार है. खुद तांगा चलाता है और साथ में मर्सडीज भी रखता है. उसकी ज़बान पर कोई ताला नहीं लगा सकता और वो मुख्यमंत्री तक को कह सकता है कि मारबो करेंगे..... जी हां हम बात कर रहे हैं मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह के बारे में.  

अनंत सिंह डॉन हैं, बहुत बड़े बाहुबली हैं,बिहार के थानों में उनके नाम से क्राइम की फाइलें भरी पड़ी है.लेकिन वो किसी से डरता नहीं क्योंकि छोटे सरकार को बड़े सरकार का समर्थन है.ये आजतक की लाइने हैं जो आजतक के शम्स ताहिर खान ने एक बार वारदात कार्यक्रम में कही थी.लेकिन राजनैतिक समीकरण बदलते ही बातें बदल गयी. छोटे सरकार के खिलाफ खुद बड़े सरकार ने ही यदुकुल के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा और देखते-देखते बड़े नाटकीय अंदाज में विधायक अनंत सिंह एक यादव युवक की हत्या के मामले में सलाखों के पीछे चले गए और अब भी वही हैं.अब तो उनकी संपत्ति की कुर्की-जब्ती होने के भी आसार दिख रहे हैं.

बहरहाल भू-मंत्र अनंत सिंह के बाहुबल की तारीफ़ या पक्ष लेने के लिए पोस्ट नहीं लिख रहा.बल्कि हमारी मंशा अनंत सिंह के बहाने गठबंधन की राजनीति के पीछे के खेल को बेनकाब करना है.दरअसल नरेंद्र मोदी के उत्थान से हर दल घबराया हुआ था.नीतिश ने विरोध किया तो बदले में मांझी की बगावत झेली और लोकसभा में महज एक सीट से संतोष करना पड़ा.इससे नीतिश बेहद घबराये हुए थे.उनकी इस घबराहट को उनसे भी ज्यादा घबराए लालू यादव ने भांप लिया और फिर दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगी और अंदरखाने मोदी लहर के काट के रूप में गठबंधन का निर्माण हुआ.लेकिन इस गठबंधन की राह का सबसे बड़ा रोड़ा अनंत सिंह बन सकते थे.बताने की जरूरत नहीं कि अनंत सिंह लालू यादव को कितना पसंद करते हैं?इसलिए अनंत नाम के रोड़े को राह से हटाना जरूरी था.इससे दो हित सधते थे. एक तो भूमिहार साइड लाइन हो जाएंगे,दूसरा कि यादवों को सीधा संदेश जाएगा और उनके वोटों का ध्रुवीकरण आसान हो जाएगा और जो विधानसभा चुनाव में हुआ भी. लालू यादव की पार्टी ने एक भी भूमिहार प्रत्याशी को कहीं से भी टिकट नहीं दिया.ये भू-समाज के प्रति लालू यादव की सोंची समझी साजिश थी जिसमें लालू उम्मीद से ज्यादा कामयाब हुए और अर्श से सत्ता के फर्श पर आ गए.शायद इसी राजनीति को उस वक्त रालोसपा के वरिष्ठ नेता अरुण कुमार ने समझकर बयान दिया था कि यदि एक खास समुदाय को ऐसे ही निशाना बनाया जाएगा तो वे नीतिश कुमार की छाती तोड़ देंगे.हालाँकि बाद में उन्होंने इसे साहित्यिक संदर्भ में कहीं गयी बात बताया.  

गौरतलब है कि जब बाहुबली अनंत सिंह की गिरफ्तारी हुई तो अनंत सिंह ने मीडिया से बातचीत करते हुए बार-बार साजिश का उल्लेख किया.और लगता है कि अनंत सिंह की बात में काफी हदतक सच्चाई भी है.क्योंकि जब सुशासन बाबू ने अनंत सिंह का हाथ थामा था तब अनंत के क्राइम फ़ाइल का उन्हें पता नहीं था.सुशासन बाबू के प्रशासन को पहले नहीं दिखा? दरअसल उसी क्राइम फ़ाइल के सर्फिकेट के बदौलत अनंत सिंह को नीतिश ने अपना हनुमान बनाया और उन्हें ऐसा भक्त हनुमान मिलता भी तो कहाँ? इसी हनुमान की पीठ पर चढ़कर उन्होंने कैसी-कैसी वैतरणी पार की है, ये तो उनका दिल ही जानता है. लेकिन मुंहफट,बेलौस,बेबाक,ठेठपन और उसपर बाहुबली/डॉन का हश्र तो यही होना था, क्योंकि अनंत बाहुबली जरूर हैं लेकिन राजनीति के बाहुबली तो ये लोग हैं क्योंकि यहाँ खेल बाहुबल से नहीं प्रपंच से होता है और जिसके शिकार अनंत सलाखों के पीछे अपनी वापसी का इंतजार कर रहे हैं जो फिलहाल तो संभव नहीं दिखता.आखिर एक यादव की हत्या का आरोप है.बाहर कैसे निकलने देंगे.यादवों का वोट खिसक जाएगा और भूमिहार वोट की किसे परवाह?फिर लालू यादव के कम्फर्ट जोन का भी तो सवाल है.लेकिन यकीन मानिए लालू जैसों को आक्रांत करने के लिए एक अनंत सिंह भी जरूरी है।बेलाग,मुंहफट,पहाड़..........

ज़मीन से ज़मीन की बात - भू-मंत्र

Comments

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

भाजपा के भरोसे कब तक रहेंगे भूमिहार,बनाते क्यों नहीं अपनी पार्टी?

एक ज़माना पहले भूमिहार समाज और बिहार की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन फिर एक आंधी आयी और उसमें सबकुछ उड़ता चला गया.जब गुबार छंटा तो भूमिहार ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे. जानिये 'शैलेन्द्र' की जुबानी पूरी कहानी (परशुराम)
1977 तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व - भूमिहार समाज आज राजनीति में हाशिये पर है.लेकिन एक वक़्त था जब भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीति में तूती बोलती थी.भारत की आज़ादी के बाद बिहार जैसे प्रदेश में तो पूरी राजनीति ही भूमिहारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही . यही वजह रही कि बिहार की राजनीति में 1977 तक श्रीकृष्ण बाबू के रूप में सिर्फ एक मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भूमिहार विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रही. 
भूमिहारों ने की ऐतिहासिक भूल - लेकिन 1977 के बाद से स्थितियां बदलने लगी. बिहार की राजनीति बदलने लगी. भूमिहारों के खिलाफ कई दूसरी जातियां लामबंद होने लगी.फिर भी भूमिहार विधायकों की संख्या में कोई ख़ास कमी नहीं आयी. लेकिन इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी सियासत का रूख पलट दिया. भू-समाज ने एक ऐतिहासिक गलती की. 1992 में कांग्रेस को …