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टारगेट मत करो नही तो फिर कोई ब्रह्मेश्वर मुखिया पैदा हो जायेगा




-आनंद प्रकाश-

यह लेख पुराना है. लेकिन लेख की प्रासंगिकता अब भी बरकरार है. इसलिए भूमंत्र के पाठकों के लिए हम इसे दुबारा प्रकाशित कर रहे हैं - 

1990 के दौर में बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद जब पिछड़ी और दलित जातियों में राजनीतिक,सामाजिक चेतना का उदय हुआ तो उनमे आगे बढ़ने की छटपटाहट दिखी,इसका फायदा सत्ता में बैठे लोगों ने उठाया और उनके मन में समाज में अगड़ी कही जाने वाली जातियों के प्रति जमकर विषवमन किया,
नतीजा यह हुआ कि समाज में वैमनष्य बढ़ता गया,कुछ सवर्ण जातियाँ तो तुरंत ही समर्पण मुद्रा में आ गयी लेकिन एक जाति विशेष ने झुकने से मना कर दिया।इसका नतीजा यह हुआ कि इन्हें जमकर प्रताड़ित किया गया,फर्जी मुक़दमे किये गए,पुलिस से कोई सहयोग नही मिले इसलिए इस जाति विशेष के तमाम अधिकारीयों जिसमे डीजीपी से लेकर दारोगा तक शामिल थे,को सीआईडी जैसे महत्वहीन जगहों पर तैनात किया गया।किसी भी राज्य के लिए यह काला दिन कहा जायेगा जब हजार से ज्यादा थानों में एक भी इंस्पेक्टर उस जाति का न हो,एक भी डीएसपी अहम् पदों पर तैनात न हो।इसके बाद इस जाति विशेष की आमदनी के मुख्य श्रोत खेती पर सरकार समर्थित नक्सलियों द्वारा आर्थिक नाकेबंदी लगायी गयी,विरोध करने वालों की हत्या हुई,कानून व्यवस्था के नाम पर हथियार जब्त कर लिए गए। 

फिर फरवरी 1992 में गया की सम्पूर्ण पुलिस बारा नामक गाँव में पहुँची और दिनभर छापामारी अभियान चलाया,तमाम हथियार जब्त कर लिए गए,यहाँ तक की परंपरागत भाले और तलवार भी,उसी रात उस गाँव में हजार की संख्या में नक्सलियों ने हमला किया,चालीस लोगों के हाथ बांधकर पंक्ति में खड़ा किया गया और फिर बारी बारी से सबके गले काट दिए गए।सम्पूर्ण समाज स्तब्ध और भयाक्रांत था,ऐसे में भोजपुर के लाल बरमेश्वर सिंह ने किसानों की मदद करने का बीड़ा उठाया,उन्होंने किसानों का डर दूर किया,उन्हें संघठित किया और लम्बी लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया।



अब लड़ाई दोतरफा हो चुकी थी,नक्सलियों को जबाब मिलने लगा था,लड़ाई का क्षेत्र भोजपुर से सोन नदी पार कर अरवल(तत्कालीन जहानाबाद)तक फ़ैल चूका था,लक्ष्मणपुर बाथे के रूप में एक बड़े नरसंहार को अंजाम दिया गया जिससे नक्सली थोड़े कमजोर तो हुए लेकिन उन्होंने कुछ दिनों में फिर चौरम में कई किसानों की हत्या कर दी,इसके बाद शंकरबीघा,नारायणपुर जैसे कई गाँवों में नरसंहार हुए,फिर बारी आयी सेनारी की,जहाँ बिल्कुल बारा की तर्ज पर सत्ता समर्थित नक्सलियों ने चालीस जाति विशेष के किसानों की गला काटकर हत्या कर दी।सत्ता पर बैठे लोगों में इस जाति विशेष के प्रति नफरत का आलम यह था कि तत्कालीन महिला मुख्यमंत्री ने यह कहते हुए सेनारी जाने से मना कर दिया कि ये लोग हमारे वोटर नही हैं।सेनारी के अधिकांश अभियुक्त सत्ता पर आसीन विरादरी से सम्बन्ध रखते थे इसलिए लड़ाई के लिए तैयार किसानों ने अपना लक्ष्य इसी बिरादरी को चुना और मियापुर में चालीस लोगों की हत्या की,ये उस दौर का आखिरी नरसंहार था जिसमे शायद असली दोषी मारे गए थे और इसके साथ ही समाज में शक्ति संतुलन भी स्थापित हो गया। 

कम ही लोग जानते हैं कि बिहार के पहले जातिय नरसंहार को 1978 में कुर्मियों ने पटना के बेलछी नामक गाँव में अंजाम दिया था,जहाँ सांत्वना के लिए इंदिरा गाँधी हाथी पर चढ़कर पहुँची थी,उसके बाद कई नरसंहार यादवों ने अंजाम दिये और इन सभी नरसंहारों के पीछे का कारण भी वही किसान-मजदुर विवाद था लेकिन आज कोई इन्हें दोषी नही कहता बल्कि ये जातियाँ भी भूमिहारों को ही दोषी ठहराती हैं।ये सही है कि भूमिहार जमींदार थे लेकिन आजादी के बाद अब कोई जमींदार नही है,सौ दो सौ बीघा वालों की संख्या पुरे बिहार में ऊँगली पर गिनी जा सकती है,फिर भी कई जातियाँ आज भी भूमिहारों के प्रति विषवमन कर रही हैं ताकि राजनीतिक रूप से सदैव जागरूक रही ये जाति कमजोर ही रहे।

आज भूमिहारों की हालत ये है कि इस समाज के युवक मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव,एटीएम गार्ड,अपार्टमेंट गार्ड आदि की नौकरी करते हैं फिर भी सामंत कहे जाते हैं।ये सही है कि इस समाज में कई गुंडे भी पैदा लिए हैं जिन्होंने समाज में आग लगाने में अपना बड़ा योगदान दिया है लेकिन भूमिहारों में से ही कई ने इन तत्वों का बहिष्कार भी किया है। हम भूमिहार जातिय सद्भाव में विश्वास रखते हैं,हमें सामंत या सवर्ण कहलाने का कोई शौक नही है,बस हमें अछूत समझकर टारगेट मत करो नही तो फिर कोई ब्रह्मेश्वर पैदा हो जायेगा।

 (अयाचक भूमिहार ब्राहमण के ब्लॉग से साभार)

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