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बीबीसी के नजरिये से जानिए बिहार में नरसंहारों का इतिहास

प्रतीकात्मक तस्वीर 


सुख-समृद्धि और समाज के विकास के लिए शांति जरूरी है.लेकिन यदि जंगलराज हो तो......! अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए क्रूरता और हिंसा हरेक जीव की मजबूरी बन जाती है.फसल किसान लगाये और काट कोई और ले जाए तो आप क्या करेंगे? आपकी बेटी की शादी हो और उसकी बारात न निकलने दिया जाए तो आप क्या करेंगे? खेती करना दुश्वार हो जाए और आपकी रोजी-रोटी का जरिया यानी कि ज़मीन छीन ली जाए तो आप क्या करेंगे? 

साधारण सा सवाल है और इसका साधारण सा जवाब है कि प्रतिरोध करेंगे. अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जो बन पड़ सकता हो, वो करेंगे. बातचीत से सुलझे तो बातचीत और शस्त्र उठाने की जरूरत हो तो शस्त्र उठाएंगे.बिहार में भी ऐसा ही हुआ जब नक्सली और वामपंथ समर्थित उग्वाद चरम पर पहुँच कर किसानों पर कहर बरपाने लगा तब रणवीर सेना का जन्म हुआ और नरसंहारों का सिलसिला शुरू हो गया जो लंबे समय तक चला. 

आज सेनारी हत्याकांड का फैसला आने वाला है तो बीबीसी ने उन नरसंहारों पर अपने नजरिये से प्रकाश डाला है. बीबीसी से साभार लेकर इसे हम भी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं. बिहार के पांच बड़े नरसंहार - 

लक्ष्मणपुर बाथे- यह बिहार के नरसंहारों में सबसे बड़ा और नृशंस नरसंहार माना जाता है. इसमें बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भी निशाना बनाया गया था. 30 नवंबर और 1 दिसंबर, 1997 की रात हुए इस नरसंहार में रणवीर सेना ने 58 लोगों की हत्या की थी. लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार ने कई परिवारों को अनाथ कर दिया था. कई परिवारों में घर का काम-काज संभालने के लिए एक महिला भी नहीं बची थी. कुछ परिवारों में तो सिर्फ बच्चे ही जीवित रह गए थे. इस मामले में पटना की एक विशेष अदालत ने 7 अप्रैल, 2010 को 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्र कैद की सजा सुनाई थी. लेकिन पटना हाइकोर्ट के नौ अक्तूबर, 2013 के फैसले में सभी दोषियों को बरी कर दिया था.


शंकर बिगहा नरसंहार- 25 जनवरी 1999 की रात बिहार के जहानाबाद जिले में हुए शंकर बिगहा नरसंहार में 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी. घटना के 16 वर्षों बाद साल 2015 में 13 जनवरी को इस मामले में फैसला सुनाया गया. जहानाबाद जिला अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 24 अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया था. जातीय नरसंहारों से जुड़ा यह शायद पहला मामला था जिसमें सभी अभियुक्त निचली अदालत से ही बरी कर दिए गए थे. मामले के सरकारी वकील अरविंद कुमार दास के मुताबिक घटना के सूचक के साथ सभी गवाह अदालत में पुलिस को दिए अपने बयाने से मुकर गए. इसी को मुख्य आधार बनाते हुए अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी किया था. इस हत्याकांड के ज्यादातर अभियुक्त शंकर बिगहा से पूरब में बमुश्किल एक किलोमीटर दूर धोबी बिगहा गांव के रहने वाले सवर्ण जाति के लोग थे.


बथानी टोला- साल 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई. माना जाता है कि बारा गांव नरसंहार का बदला लेने के लिए ये हत्याएं की गई थी. गया जिले के बारा गांव में माओवादियों ने 12 फरवरी 1992 को अगड़ी जाति के 35 लोगों की गला रेत कर हत्या कर दी थी. साल 2012 में उच्च न्यायालय ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को भी बरी कर दिया था. इस मामले में निचली अदालत ने तीन अभियुक्तों को फांसी और 20 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दी थी.


मियांपुर नरसंहार- औरंगाबाद जिले के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में जुलाई 2013 में उच्च न्यायलय ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से नौ को बरी कर दिया था. निचली अदालत ने इन सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास का सजा सुनाई थी. 

बेल्छी नरसंहार- साल 1977 में पटना ज़िले के बेल्छी गाँव में एक खास पिछड़ी जाति के लोगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी. यह नरसंहार समकालीन इतिहास के पन्नों में एक खास घटना के कारण भी दर्ज है. उस वक्त सत्ता से बेदखल हो चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाथी पर बैठ कर बाढ़ से घिरे इस गांव का दौरा किया था.

ज़मीन से ज़मीन की बात - भू-मंत्र

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