Skip to main content

पीएम मोदी की चुटकी से केजरीवाल की उड़ी खिल्ली




चाहे मौका कोई भी क्यों न हो, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करने से नहीं चूकते. खुद अपने और अपने मंत्रियों पर लगे आरोपों का जवाब नहीं देते और दूसरों पर हवाई आरोप लगाते रहते हैं. लेकिन कई बार ऐसे आरोप लगाना भारी भी पड़ता है और खुद की खिल्ली उड़ जाती है. फिर सामने प्रधानमंत्री मोदी जैसे वाकपटु नेता बैठे हो तो सोंच-समझकर बोलना चाहिए, वर्ना आपके साथ वही होगा जो कल केजरीवाल के साथ हुआ. 

दरअसल सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट की स्वर्ण जयंती थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी और न्यायाधीशों के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल भी उपस्थित थे. इसमें जब केजरीवाल साहब की बोलने की बारी आयी तो उन्होंने आदतन केंद्र सरकार पर निशान साधने की नीयत से ये कहकर बवाल पैदा करने की कोशिश की कि जजों के फोन टेप किये जा रहे हैं और ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा हमला है. 

बहरहाल ये कहकर केजरीवाल ने माहौल में भारीपन पैदा करने की कोशिश की. साथ में केजरीवाल की मंशा प्रधानमंत्री मोदी को असहज करना भी था. लेकिन मोदी तो मोदी है.उन्होंने अपने भाषण में केजरीवाल का नाम तक नहीं लिया और आरोपों के चक्रव्यूह को हंसी के फव्वारे में उड़ा दिया. 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मुझे कभी अदालत जाने का सौभाग्य नहीं मिला, लेकिन सुना है कि वह का माहौल काफी गंभीर होता है. इसका असर समारोह में भी दिख रहा है.आप लोग हाई कोर्ट की स्वर्ण जयंती मना रहे हैं, थोड़ा मुस्कुराइए. 

पीएम के इतना कहते ही कार्यक्रम में मौजूद न्यायधीश और दूसरे लोग ठहाके मारकर हँसने लगे.और इस तरह केजरीवाल का चक्रव्यूह ताश की पत्ते की तरह बिखर गया. एक तरह से पीएम की चुटकी पर हंसकर जजों ने केजरीवाल की बात को ख़ारिज कर दिया. यूँ पीएम की चुटकी पर केजरीवाल के आरोप की उड़ गयी खिल्ली.


ज़मीन से ज़मीन की बात - भू-मंत्र

Comments

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

भाजपा के भरोसे कब तक रहेंगे भूमिहार,बनाते क्यों नहीं अपनी पार्टी?

एक ज़माना पहले भूमिहार समाज और बिहार की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन फिर एक आंधी आयी और उसमें सबकुछ उड़ता चला गया.जब गुबार छंटा तो भूमिहार ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे. जानिये 'शैलेन्द्र' की जुबानी पूरी कहानी (परशुराम)
1977 तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व - भूमिहार समाज आज राजनीति में हाशिये पर है.लेकिन एक वक़्त था जब भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीति में तूती बोलती थी.भारत की आज़ादी के बाद बिहार जैसे प्रदेश में तो पूरी राजनीति ही भूमिहारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही . यही वजह रही कि बिहार की राजनीति में 1977 तक श्रीकृष्ण बाबू के रूप में सिर्फ एक मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भूमिहार विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रही. 
भूमिहारों ने की ऐतिहासिक भूल - लेकिन 1977 के बाद से स्थितियां बदलने लगी. बिहार की राजनीति बदलने लगी. भूमिहारों के खिलाफ कई दूसरी जातियां लामबंद होने लगी.फिर भी भूमिहार विधायकों की संख्या में कोई ख़ास कमी नहीं आयी. लेकिन इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी सियासत का रूख पलट दिया. भू-समाज ने एक ऐतिहासिक गलती की. 1992 में कांग्रेस को …