Skip to main content

सेनारी नरसंहार पर सोशल मीडिया पर नील बटे सन्नाटा, भूमिहार नेता भी चुप्पी साध गए

सेनारी मामले पर कवरेज 


-परशुराम- 

माफ कीजियेगा समाज दोगला है तो वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी सबसे बड़े दोगले हैं. इसका ताजा उदाहरण सेनारी नरसंहार मामले में 23 नरपिशाचों की सबूतों के अभाव में छूटने के बाद सोशल मीडिया पर छायी ख़ामोशी है. कहीं से कोई आवाज़ नहीं, न्याय की दुहाई नहीं. आपको याद होगा कि जब लक्ष्मनपुर बाथे मामले में कोर्ट का फैसला आया था तब सोशल मीडिया पर कम्युनिस्टों ने कैसे छाती पिटी थी कि न्यायालय ने लक्ष्मणपुर बाथे के आरोपियों को रिहा कर कितना बड़ा अनर्थ कर दिया. चलिए मान लेते हैं कि अन्याय हो भी गया तो छाती पीटते वे तथाकथित बुद्धिजीवी सेनारी नरसंहार मामले में नरपिशाचों की रिहाई के बाद कहाँ गायब हैं? न छाती पीट रहे हैं और न विधवा विलाप कर रहे हैं. छाती पीटना तो दूर सोशल मीडिया पर दो लाइन भी लिखना उन्हें गंवारा नहीं. बिना डकार मारे ही पूरे मामले को पचा गए. 

लेकिन दोहरे चरित्र वाले इन बुद्धिजीवियों से ज्यादा भू-समाज के अपने बुद्धिजीवियों से तकलीफ है जिनकी तरफ से प्रतिरोध का कोई स्वर नहीं फूटा. दिल्ली-मुंबई और देश-विदेश में रह रहे प्रतिष्ठित भू-बंधू वैसे तो अपनी ज़मीन से प्यार करते हैं लेकिन अपनी ज़मीन पर लहू बहाने वालों के खिलाफ आक्रामक शैली में प्रतिरोध नहीं करते. तभी श्री विदेह सोशल मीडिया पर लिखते हैं -

सेनारी की घटना पर कोर्ट का जजमेंट आया...23 हत्यारे बरी हो गये... समाज ने कोई प्रतिक्रिया दी क्या? ऐसा लगा मानो यह घटना किसी दूसरे देश में घटी हो..?किसी ने एक शब्द भी न कहा...समाज की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं ।। कटु सत्य है कि आज भू-समाज के साथ कोई नहीं और यह समाज बेपरवाह आत्म-मुग्धता में जी रहा है । 

बात सही है. समाज के प्रतिष्ठित लोगों की बात छोडिये, सेनारी नरसंहार मामले में फैसला आने के बाद तमाम भूमिहार नेता भी चुप्पी साध गए. किसी भी पार्टी के किसी भी भूमिहार नेता की तरफ से शायद ही कोई मुखर बयान आया हो. श्रीबाबू जयंती पर उछल-कूद मचाकर भूमिहारों को रिझाने की कोशिश करने वाले तमाम नेता ऐसे मुद्दे पर मौनव्रत पर चले गए. आजकल सबसे ज्यादा आक्रमक माने जाने वाले गिरिराज सिंह भी कुछ नहीं बोले. यानी जहाँ कड़ा स्टैंड लेने की बात आती है तो हमारे भू-नेता बगले झाँकने लगते हैं और आप इन नेताओं के भरोसे भू-समाज को सशक्त बनाना चाहते हैं. माफ कीजियेगा लेकिन आपके नेता भी कम दोगले नहीं. आपको इन्हें बदलना ही होगा. नया ब्रहमेश्वर मुखिया, नए अवतार में लाना ही होगा.


ज़मीन से ज़मीन की बात - भू-मंत्र

Comments

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

भाजपा के भरोसे कब तक रहेंगे भूमिहार,बनाते क्यों नहीं अपनी पार्टी?

एक ज़माना पहले भूमिहार समाज और बिहार की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन फिर एक आंधी आयी और उसमें सबकुछ उड़ता चला गया.जब गुबार छंटा तो भूमिहार ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे. जानिये 'शैलेन्द्र' की जुबानी पूरी कहानी (परशुराम)
1977 तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व - भूमिहार समाज आज राजनीति में हाशिये पर है.लेकिन एक वक़्त था जब भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीति में तूती बोलती थी.भारत की आज़ादी के बाद बिहार जैसे प्रदेश में तो पूरी राजनीति ही भूमिहारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही . यही वजह रही कि बिहार की राजनीति में 1977 तक श्रीकृष्ण बाबू के रूप में सिर्फ एक मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भूमिहार विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रही. 
भूमिहारों ने की ऐतिहासिक भूल - लेकिन 1977 के बाद से स्थितियां बदलने लगी. बिहार की राजनीति बदलने लगी. भूमिहारों के खिलाफ कई दूसरी जातियां लामबंद होने लगी.फिर भी भूमिहार विधायकों की संख्या में कोई ख़ास कमी नहीं आयी. लेकिन इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी सियासत का रूख पलट दिया. भू-समाज ने एक ऐतिहासिक गलती की. 1992 में कांग्रेस को …