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इंडिया न्यूज़ की पत्रकार रिम्मी शर्मा की जुबानी सेनारी हत्याकांड की आंखो देखी कहानी

रिम्मी शर्मा, पत्रकार, इंडिया न्यूज़ 


भारत में सेनारी नरसंहार जैसे कई नरसंहार हुए हैं और खबरों की दुनिया में उसने जगह भी बनाई है. लेकिन गुजरते वक्त के साथ ये ख़बरें नरसंहार में मारे गए लोगों की ही तरह दफ़न हो जाते हैं. फिर किसी को कुछ भी याद नहीं रहता. लेकिन जहाँ ऐसे नरसंहार होते हैं वहां जख्म ऐसे गहरे होते हैं कि वर्षों बाद भी नहीं भरते. इंडिया न्यूज़ की पत्रकार 'रिम्मी शर्मा' के साथ भी ऐसा ही है. इस नरसंहार में उन्होंने अपने को खोया है और उस दहशत को याद कर अब भी काँप जाती हैं. सेनारी हत्याकांड के मसले पर न्यायालय के फैसले पर वे अपने आप को रोक नहीं पायी और भावुक होकर उन्होंने विस्तार से इस बारे में अपने ब्लॉग पर लिखा है. उसे भू-मंत्र के पाठकों के लिए हम साभार यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं. आपको जरूर पढ़ना चाहिए. (भूसेवक)



इंडिया न्यूज़ की पत्रकार रिम्मी शर्मा से सुनिए सेनारी नरसंहार की दिल दहलाने वाली कहानी :

आज 17 साल बाद सेनारी हत्याकांड का फैसला आया. 38 आरोपियों में से 15 को अदालत ने दोषी पाया और 23 के रिहा होने का फैसला दिया. आप में से अधिकतम लोगों को पता भी नहीं होगा ये कौन सा हत्याकांड था, कब हुआ था, क्यों हुआ था और मरने वाले कौन थे. जैसा की अमूमन हर घटना के बाद होता है. जब तक वो सुर्खियों मेें रहती है हमें याद रहता है और खबर ठंडी होने के साथ ही हम भी उसे भूल जाते हैं. ये भयावह मंजर अगर किसी को नहीं भूलता तो सिर्फ उनलोगों को जो अपनों को खोते हैं. जिनका घर उजड़ जाता है, संसार तबाह हो जाता है. ऐसे ही ये बिहार का चर्चित हत्याकांड मेरे जेहन में हमेशा ताजा रहती है क्योंकि मैं इसकी भुक्तभोगीं हूं. इस नरसंहार में मैने अपनों को खोया था वो भी एक- दो नहीं बल्कि छह लोग!

जीवन की कभी ना भूलने वाली घटनाओं में से एक थी ये घटना. सबकुछ मेरे दिमाग में ऐसे छपा है जैसे कल की ही बात हो. वो 18 मार्च 1999 की सुबह थी. मेरे 10वीं के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे. तीन पेपर हो चुके थे 20 मार्च को मैथ्स का और 23 मार्च को सोशल साइंस का एक्जाम बचा हुआ था. घर में केबल टीवी नहीं था इसलिए रोजाना हम सुबह सात बजे का दूरदर्शन पर आने वाले समाचार को देख बीती रात में देश-दुनिया की बड़ी खबरों से रु-ब-रु होते थे. हर रोज की तरह उस रोज भी पापा ने टीवी चलाया. टीवी पर हेडलाइन चल रही थी. पहली ही हेडलाइन को एंकर ने पढ़ा- बिहार के जहानाबाद जिले स्थित सेनारी गांव में 35 लोगों की नृशंस हत्या! हम टीवी देखते नहीं सुनते थे. वो सुबह भी हमारी आम दिनों की ही सुबह थी. मम्मी आंगन में चूल्हे पर नाश्ता बना रही थी. पापा बाहर क्यारियों में पानी दे रहे थे, मैं पढ़ रही थी. सभी अपने काम में मग्न टीवी सुन रहे थे. पर इस हेडलाइन को सिर्फ मैने सुना. मैं पापा के पास भागी, मम्मी आंगन से दौड़ी आई. हम सब अब टीवी के आगे चिपक गए. किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि ये मेरे ही घर आंगन को मीडिया कवर कर रही है. ये बात मेरे ही आंगन की हो रही है. समाचार खत्म हुआ. फोन की कोई सुविधा नहीं थी और दूरदर्शन के उस समाचार से हम ये मान ही नहीं पाए की नरसंहार का गवाह हमारा ही गांव बना है.




पड़ोस में रहमान अंकल के घर केबल लगा था. हम सभी भागे-भागे उनके घर इस न्यूज को कन्फर्म करने पहुंचे. कई बार एक ही खबर को देखने के बाद यकीन हो गया कि 'शायद' ये हमारा ही सेनारी गांव है! हर तरफ कोहराम मच गया. महल्ले की आंटियां हमारे घर आकर मम्मी के पास सांत्वना देने बैठ गयीं. पापा आनन-फानन में घर से तीन किलोमीटर दूर के एसटीडी बूथ पर फोन करने गए. किसी को कुछ समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है और आखिर ये सब हुआ कैसे. जैसे तैसे दिन बीता. शाम को फिर पापा एसटीडी बूथ पर गए. उधर से जो खबर आई वो बस दिल को हिला देने के लिए काफी थी, हालांकि हम सभी इस सच्चाई को कहीं ना कहीं मान चुके थे कि खबरों का हिस्सा हम बन चुके हैं. पर फिर भी दिल के किसी कोने में ये आस लगाए बैठे थे कि हमारा सोचना गलत हो जाए.

पापा घर आए और उनका रो-रोकर बुरा हाल. मैने पापा को उस तरह से रोते उसके पहले कभी नहीं देखा था. बच्चों की तरह चिंघाड़े मार, छातियां पीट-पीट रोना. जमीन में रोते रोते गिर पड़ना. कभी ना भूलने वाला ये मंजर मेरी आंखों के सामने चल रहा था. मम्मी एक कोने में रो रही थी, मैं और मेरा छोटा भाई कभी मम्मी से लिपटते तो कभी पापा से. बदहवासी का वो पहला मंजर था मेरी याद में. अगले दिन सुबह पापा पटना निकल गए. वहां जाकर पता चला कि पापा के एक चचेरे भाई इस घटना को सहन ही नहीं कर पाए और गांव में अपनी आंखों के सामने इतनी लाशें उसमें से परिवार के चार लोगों को ढ़ेर देख हार्ट-अटैक के शिकार हो गए. मौके पर उनकी मौत हो गई और हमारे खानदान से एक और नाम मिट गया.

इन मौतों पर राजनीति भी खूब हुई और बाजार भी भरपूर लगा. पर हमने जो खोया वो सिर्फ और सिर्फ राजनीति की ही देन थी. सवर्ण बनाम दलित कार्ड खेलकर सरकारें बनीं, राबड़ी देवी ने कहा सेनारी से हमें वोट नहीं आता इसलिए हम उस गांव का दौरा नहीं करेंगे! सेनारी हत्याकांड का बदला लेने के नाम पर सवर्णों ने पास के ही मियांपुर गांव में कत्लेआम मचाया. इस खूनी खेल में मुझे नहीं पता किसी को मिला क्या, पर इतना पता है कि खोया बहुतों ने. कई बच्चे अनाथ हो गए. गांव के गांव का भविष्य खत्म हो गया जो आज भी पिछड़ेपन में ही जी रहे हैं. आत्मा की शांति तो आज बहुतों को मिली होगी पर सबसे ज्यादा खुशी मुझे उस दिन होगी जब इस तरह के तमाम कत्लेआम और घटनाओं को करने वाले नहीं बल्कि करवाने वाले सूलियों पर चढ़ाए जाएंगे. 

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