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Showing posts from October, 2016

सेनारी मामले में भू-मंत्र की रिपोर्ट पर दैनिक जागरण का ठप्पा

भू-मंत्र लगातार सेनारी नरसंहार को सत्ता प्रायोजित नरसंहार कहता आया है और ज़मीनी हकीकत जानने वाले शायद ही किसी निष्पक्ष व्यक्ति को इस बात पर संदेह होगा. इस संदर्भ में जहानाबाद से आयी आनंद प्रकाशकी रिपोर्ट में सेनारी हत्याकांड में सरकारी हाथ होने और किसानों का मनोबल तोड़ने की बात का जिक्र प्रमुखता से किया गया था. अब इसी पर जागरण ने भी अपनी मुहर लगाते हुए बकायदा इसपर रिपोर्ट की है.पढ़िए रिपोर्ट - 
तत्कालीन सरकार की मंशा ठीक नहीं,सेनारी मामले में जागरण की रिपोर्ट :  अरवल। बहुचर्चित सेनारी नरसंहार के पीड़ितों ने फैसले पर असंतोष जाहिर करते हुए इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उन लोगों का कहना है कि जिस शासन में यहां नरसंहार की घटना हुई थी आज वह सरकार का घटक दल बना हुआ है। 
सरकार के इशारे पर पुलिस प्रशासन के लोगों ने न्यायालय के समक्ष पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया। पीड़ित व पूर्व मुखिया कमलेश शर्मा, सौरव कुमार, मुकेश कुमार, शिवराम शर्मा सहित अन्य लोगों ने कहा कि 34 लोगों की गला रेतकर नृशंस हत्या की गई थी। इस घटना को अंजाम देने में सिर्फ 15 लोग हीं नहीं हो सकते हैं। इनलोगों न…

नरेंद्र मोदी ने बनाया छठ को राष्ट्रीय पर्व

बिहार और झारखण्ड का छठ पर्व अब किसी परिचय का मोहताज नहीं. फैलते-फैलते अब छठ लगभग देश के तमाम राज्यों में पूरी श्रद्धा से मनाया जाता है. न्यूज़ चैनलों पर दिखाया जाता है. तमाम राजनीतिक पार्टियां इसपर राजनीति भी करती है. वाकई में ये पर्व अपने -आप में अनोखा है भी क्योंकि इसमें बिना किसी बाह्रय आडंबर के प्रकृति की पूजा की जाती है और सूर्यदेव को अर्क दिया जाता है. 
लेकिन तमाम बातों के बावजूद मन की बात में छठ के महत्व पर खास तौर पर बोलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे राष्ट्रीय पर्व का दर्ज दिलवाया है और इस कारण वे तारीफ़ के हकदार भी हैं. छठी मैया की उनपर कृपा जरूर बरसेगी. 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार के अपने मन की बात में कहा कि दुनिया भर में लोग उगते सूर्य की पूजा करते हैं, लेकिन छठ एकमात्र ऐसा त्योहार है, जिसमें लोग अस्त होते सूर्य की भी अराधना करते हैं, जो एक बड़ा सामाजिक संदेश देता है.
उन्होंने आगे कहा, छठ पूर्वी भारत का बड़ा त्योहार है और यह पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह चार दिनों तक चलता है. कहा कि छठ पूजा सूर्य को धन्यवाद अदा करने के लिए किया जाता है, जिन्हें ऊर्ज…

शहीद 'राजीव कुमार राय' को भू-मंत्र करता है सलाम, आखिरी विदाई देने उमड़ा जनसमूह

हम दीपावली में दीया जलाते हैं ताकि हमारा घर खुशियों से जगमगा उठे. लेकिन हमारे घर का दीया जलता रहे इसके लिए बॉर्डर पर भारतीय सेना के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर दुश्मनों से लोहा लेते हैं और शहीद भी होते हैं. ऐसे ही एक शहीद वैशाली जिले के राजीव कुमार राय हैं जिन्होंने सीमा की सुरक्षा करते हँसते-हँसते आपनी जान दे दी और अब पूरे देश और भू-समाज को उनपर नाज है. 
शहीद राजीव कुमार राय जम्मू = कश्मीर में तैनात थे और पाकिस्तान की ओर से हुई भीषण गोलीबारी में मारे गए थे. राजीव कुमार राय का पार्थिव शरीर आज उनके गांव वैशाली जिले के महुआ पहुंचा. राजीव का शव पहुंचते ही पूरा गांव गम में डूब गया. चारों ओर शोक की लहर दौड़ गयी. इतना ही नहीं पूरा गांव उमड़कर राजीव के घर पहुंचा और स्थानीय ग्रामीणों के अलावा हजारों लोगों ने भारत-माता की जय के नारे के साथ अपने शहीद जवान को आखिरी विदाई दी. 
प्रभात खबर की रिपोर्ट की माने तो राजीव के गांव चकखजे गोविंदपुर में एक भी ऐसा शख्स नहीं था जिसकी आंखों में आंसू ना हो. वे भारतीय सेना में हवलदार के पद पर थे.दो दिन पहले पाकिस्तानी गोलीबारी में बुरी तरह जख्मी हो गये थे. उ…

सेनारी के उस मंदिर में भी क्यों न मनोबल का एक दीया जले !

कहते हैं कि सेनारी नरसंहार सत्ता प्रायोजित था और मकसद सवर्ण किसानों का मनोबल तोड़ना था. लेकिन क्या लालू-राबड़ी सरकार अपने मकसद में कामयाब हुए? निष्पक्ष रूप से देखिये तो ये मानने में कोई शक नहीं कि आंशिक रूप से ही सही, लेकिन उन्हें सफलता जरूर मिली और साथ में बोनस के रूप में पिछडों का उनका वोट बैंक भी और अधिक सुदृढ़ हुआ. 
दूसरी तरफ सेनारी की प्रतिक्रिया में स्वतंत्र किसानों द्वारा कार्रवाई तो हुई, लेकिन सेनारी गाँव में जो भय का वातावरण पसरा, वो सत्रह साल से आज भी बदस्तूर कायम है. इसकी गवाही गाँव का वो मंदिर दे रहा है जिसमें सत्रह साल पहले बहुचर्चित सेनारी हत्याकांड हुआ था. भगवान के मंदिर में रक्तपात करके मंदिर को अपवित्र किया गया था. तब से ये मंदिर जीर्ण-शीर्ण हालत में बंद है. कोई यहाँ पूजा नहीं करता. भगवान की अराधना नहीं होती. मानो भगवन भी किसी श्राप की सजा काट रहे हैं. 
लेकिन आप दूसरे नजरिये से देखिये तो ये भय का प्रतीक भी है. कमजोर मनोबल का परिचायक भी है. मानते हैं कि जहाँ 34 लोगों की एक साथ नृशंस हत्या कर दी गयी हो, वहां पैर रखते ही रूह तो कांपेगी ही. अपनों की याद आएगी ही और खौफ़जदा…

सेनारी नरसंहार पर सोशल मीडिया पर नील बटे सन्नाटा, भूमिहार नेता भी चुप्पी साध गए

-परशुराम- 

माफ कीजियेगा समाज दोगला है तो वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी सबसे बड़े दोगले हैं. इसका ताजा उदाहरण सेनारी नरसंहार मामले में 23 नरपिशाचों की सबूतों के अभाव में छूटने के बाद सोशल मीडिया पर छायी ख़ामोशी है. कहीं से कोई आवाज़ नहीं, न्याय की दुहाई नहीं. आपको याद होगा कि जब लक्ष्मनपुर बाथे मामले में कोर्ट का फैसला आया था तब सोशल मीडिया पर कम्युनिस्टों ने कैसे छाती पिटी थी कि न्यायालय ने लक्ष्मणपुर बाथे के आरोपियों को रिहा कर कितना बड़ा अनर्थ कर दिया. चलिए मान लेते हैं कि अन्याय हो भी गया तो छाती पीटते वे तथाकथित बुद्धिजीवी सेनारी नरसंहार मामले में नरपिशाचों की रिहाई के बाद कहाँ गायब हैं? न छाती पीट रहे हैं और न विधवा विलाप कर रहे हैं. छाती पीटना तो दूर सोशल मीडिया पर दो लाइन भी लिखना उन्हें गंवारा नहीं. बिना डकार मारे ही पूरे मामले को पचा गए. 
लेकिन दोहरे चरित्र वाले इन बुद्धिजीवियों से ज्यादा भू-समाज के अपने बुद्धिजीवियों से तकलीफ है जिनकी तरफ से प्रतिरोध का कोई स्वर नहीं फूटा. दिल्ली-मुंबई और देश-विदेश में रह रहे प्रतिष्ठित भू-बंधू वैसे तो अपनी ज़मीन से प्यार करते हैं लेकिन अपनी ज़मीन…

सत्ता प्रायोजित सेनारी नरसंहार से मनोबल टूटा नहीं और असली दोषियों को उनके घर में ही ढेर कर दिया गया

-आनंद प्रकाश- सेनारी हत्याकांड पर जहानाबाद से आनंद प्रकाश  की रिपोर्ट
सेनारी नरसंहार राबड़ी देवी के शासनकाल में हुआ. त्रासदी है कि अब जब फैसला आया तब एक बार फिर लालू यादव एंड कंपनी सत्ता में है. यानी सत्रह साल बाद भी कुछ नहीं बदला तो उस इलाके की तकदीर कैसे बदलेगी? सरकार ने सबूत नहीं पेश किये और हत्यारे छूट गए. सरकार तब भी उनके साथ थी और आज भी उनके साथ है. सवर्ण किसानों का वजूद कल भी संकट में था और आज भी है. पढ़िए जहानाबाद से आनंद प्रकाश की रिपोर्ट (भू-मंत्र)-

कतार लगाकर गर्दन काटते हैवान और मौत का इंतजार करते सेनारी गाँव के लोग

18 मार्च 1999, सेनारी गाँव. वह भयानक मंजर था और चश्मदीद अब भी याद करके काँप उठते हैं. चश्मदीदों में से एक संजय और राकेश भी थे जिनकी जान इसलिए बच गयी क्योंकि शराब के नशे में माओवादी हत्यारों को उनके जिंदा होने का पता ही नहीं चला.

चश्मदीद बताते हैं कि माओवादी सेनारी गाँव के ग्रामीणों को कतार में खड़ा करके ऐसे काट रहे थे जैसे कि भेड़-बकरियों को काटा जाता है या मुर्गे को जब्बह किया जाता है. 18 मार्च 1999 की उस काली रात में वहां मौजूद सेनारी का हर किसान बेबसी से अपनी मौत का इंतजार कर रहा था.

राकेश शर्मा बताते हैं कि छह कातिल धारदार हथियार से एक-एक कर युवकों की गर्दन रेत रहे थे. कुछ का पेट फाडकर अंतरिया तक निकाल डाली गयी.वो हैवानियत की परकाष्ठा थी. गौरतलब है कि सभी युवाओं को दो ग्रुप में दर्जनों हमलावरों ने कसकर जकड़ रखा था.

संजय बताते हैं कि लाशों के ढेर पर पड़े वे सांस रोके मौत का इंतजार कर रहे थे. हत्यारे आए और उनपर वार भी किया और फिर मरा हुआ जानकार फेंक कर चले गए.

राकेश शर्मा की कहानी और भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाला है. राकेश की हत्या के इरादे से जब हत्यारों ने उनकी गर्दन पर वार किया तो…

इंडिया न्यूज़ की पत्रकार रिम्मी शर्मा की जुबानी सेनारी हत्याकांड की आंखो देखी कहानी

भारत में सेनारी नरसंहार जैसे कई नरसंहार हुए हैं और खबरों की दुनिया में उसने जगह भी बनाई है. लेकिन गुजरते वक्त के साथ ये ख़बरें नरसंहार में मारे गए लोगों की ही तरह दफ़न हो जाते हैं. फिर किसी को कुछ भी याद नहीं रहता. लेकिन जहाँ ऐसे नरसंहार होते हैं वहां जख्म ऐसे गहरे होते हैं कि वर्षों बाद भी नहीं भरते. इंडिया न्यूज़ की पत्रकार 'रिम्मी शर्मा' के साथ भी ऐसा ही है. इस नरसंहार में उन्होंने अपने को खोया है और उस दहशत को याद कर अब भी काँप जाती हैं. सेनारी हत्याकांड के मसले पर न्यायालय के फैसले पर वे अपने आप को रोक नहीं पायी और भावुक होकर उन्होंने विस्तार से इस बारे में अपने ब्लॉग पर लिखा है. उसे भू-मंत्र के पाठकों के लिए हम साभार यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं. आपको जरूर पढ़ना चाहिए. (भूसेवक)

इंडिया न्यूज़ की पत्रकार रिम्मी शर्मा से सुनिए सेनारी नरसंहार की दिल दहलाने वाली कहानी : आज 17 साल बाद सेनारी हत्याकांड का फैसला आया. 38 आरोपियों में से 15 को अदालत ने दोषी पाया और 23 के रिहा होने का फैसला दिया. आप में से अधिकतम लोगों को पता भी नहीं होगा ये कौन सा हत्याकांड था, कब हुआ था, क्यों हुआ था और…

सेनारी गाँव के ग्रामीणों ने भी उठाया भू-मंत्र वाला सवाल

भू-मंत्र पर कल हमने एक पोस्ट "माईलॉर्ड यकीन नहीं होता कि 15 गीदड़ों ने 34 शेरों का शिकार किया"  शीर्षक से डाला था. इसके जरिए हमने सेनारी नरसंहार मामले में कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया था. सवाल ये था कि न्यायालय ने सिर्फ 15 लोगों को ही सिर्फ हत्यारा माना, बाकी 23 को आरोप मुक्त कर दिया गया. लेकिन सवाल है कि ये 15 लोग अपने से तगड़े 34 प्रतिद्वंदियों को उनके गाँव में घुसकर कैसे मार सकते हैं? 
अब यही सवाल सेनारी गाँव के भुक्तभोगियों की जुबान पर भी है. नेटवर्क 18 ग्रुप के चैनल ईटीवी ने जब सेनारी गाँव के नरसंहार पीड़ित परिवार के मुकेश कुमार से बात की तो उन्होंने न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस फैसले से गांव के लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ है. यह कैसे संभव है कि 15 लोगों ने मिलकर 34 लोगों की निर्मम तरीके से हत्या कर दी है. सेनारी गांव की आबादी 200 है. 
उस घटना को याद करते हुए मुकेश कुमार कहते हैं कि उनके छोटे भाई नीरज कुमार और चाचा वीरेंद्र कुमार की निर्मम तरीके से गला काटकर हत्या कर दी गई थी. इस वारदात को अंजाम देने में आस पास गांवोें के साथ बाहर के काफी संख्या में लोग श…

सेनारी नरसंहार को देख जब भगवान भी काँप गए,17 साल से बंद है मंदिर

मंदिर भगवान का घर होता है लेकिन उस मंदिर में जाकर कोई कुकृत्य करे तो भगवान भी नाराज़ हो जाते हैं और अपने द्वार बंद कर देते हैं. 
बिहार के अरवल जिले के सेनारी गांव में 17 साल पहले ऐसा ही हुआ जब मंदिर रक्तरंजित हो गया और उस घटना को देख भगवान भी एक बार काँप गए होंगे.लेकिन प्रभु से ये मासूम जिज्ञासा भी है कि अपने सामने ऐसा अनर्थ उन्होंने होने कैसे दिया? 
सेनारी में 17 साल पहले गाँव के इसी मंदिर में चुन-चुनकर 34 भू-किसानों की हत्या एक के बाद एक कर हुई थी. ह्त्या का तरीका भी बेहद निर्मम और दिल दहलाने वाला था. 
सभी 34 लोगों की हत्या गला रेत कर गाँव के मंदिर के द्वार पर की गयी थी. तब से आज तक उस मंदिर के द्वार बंद हैं. गांव के लोगों ने इस मंदिर में पूजा पाठ करना बंद कर दिया है. 
ग्रामीणों के मुताबिक भगवान के द्वार पर लोगों की हत्या कर दी गई है. लिहाजा मंदिर में पूजा करने का क्या फायदा ? अब पिछले 17 सालों में यह मंदिर वीरान पड़ा हुआ है.

माईलॉर्ड यकीन नहीं होता कि 15 गीदड़ों ने 34 शेरों का शिकार किया : सेनारी नरसंहार

सेनारी नरसंहार : न्याय की देवी के आँखों पर सचमुच पट्टी बंधी हुई है. माफ कीजियेगा लेकिन सेनारी नरसंहार पर जो फैसला माननीय न्यायालय का आया है, उसपर यही कहा जा सकता है. 
न्यायालय ने 15 को दोषी माना और 23 को बाईज्जत बरी कर दिया. माईलॉर्ड के फैसले से हमें मायूसी नहीं, लेकिन ये यकीन नहीं होता कि 15 गीदड़ों ने 34 शेरों का घेरकर शिकार किया. 
भूमिपुत्रों के नाम से जिनकी रूह काँप जाया करती है वो 15 लोगों के साथ पूरे गाँव पर हमला करेंगे और सफल भी हो जाएंगे. माईलॉर्ड यकीन नहीं होता. कम -से-कम ऐसा फैसला देने के पहले इतिहास के पन्ने तो उलट लेते. 
इतिहास न सही कम - से कम जंगल का कानून तो पढ़ लेते. शेर और गीदड़ की पहचान तो कर लेते. झुंड बनाकर भी गीदड़ एक शेर पर हमला बोलने से पहले हिचकता रहता है. 
इस फैसले से बेहतर होता कि सर्जिकल स्ट्राइक की तरह न्यायालय यही मान लेता कि कोई हत्या हुई ही नहीं और हुई भी है तो हत्यारा कोई है ही नहीं. 
सिर्फ 23 को ही क्यों बाकी 15 को भी रिहा कर दीजिए. जंगल में शेर निपट लेगा और आप तो जानते ही हैं कि जंगल में शेर की क्या औकात होती है.


सेनारी नरसंहार में माओवादियों की क्रूरता देख रिटायर्ड जज की हो गई थी मौत

हत्याओं का सिलसिला कभी नहीं थमता. आप चार मारेंगे, वो दस मारेंगे, आप फिर बीस मारेंगे और अंतहीन सिलसिला चलता रहता है. नतीजा कुछ नहीं निकलता, सिर्फ बर्बादी होती है. लेकिन कई बार अपनी रक्षा के लिए शस्त्र उठाना पड़ता है और शास्त्रों में भी इसे सही माना गया है. 
रणवीर सेना ने भी ऐसा ही कुछ किया था तो उसकी कार्रवाई पर पूरे देश के वामपंथी हाय-तौबा करने लगे. लेकिन दोहरा चरित्र ये रहा कि बथानी नरसंहार पर छाती पीटने वाले वामपंथी सेनारी नरसंहार जैसे हत्याकांड पर चुप्पी साध जाते हैं. ये एक तरह का मूक समर्थन ही होता है. 
बहरहाल वापस सेनारी नरसंहार हत्याकांड पर वापस आते हैं और आपको उस हत्याकांड की भयावहता से संबंधित एक किस्सा बताते हैं. उससे आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि सेनारी के भू-किसानों की हत्या करने में माओवादियों ने कितनी क्रूरता दिखाई. दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट -

शवों को देख सेवानिवृत जज की हो गई थी मौत जहानाबाद :
दरअसल अरवल जिले के वंशी थाना क्षेत्र के सेनारी गांव निवासी व उच्च न्यायालय के सेवानिवृत निबंधक पद्म नारायण सिंह एक साथ गांव के 34 लोगों के शवों को देखते हीं बेहोश हो गए। दरअसल उन…

सेनारी नरसंहार मामले में 15 आरोपी दोषी साबित हुए तो सबूतों के अभाव में 23 हत्यारे बरी

सेनारी नरसंहार अपडेट - 34 निहत्थे किसानों की सेनारी गाँव में निर्मम हत्या के मामले में जहांनाबाद के सेशन कोर्ट ने आज फैसला सुना दिया. फैसले में 15 दोषी साबित हुए तो 23 लोगों को बरी भी कर दिया गया. बरी होने वालों को संदेह का लाभ मिला. 
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तृतीय रंजीत कुमार सिह ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन कई अभियुक्तों के खिलाफ साक्ष्य प्रस्तुत करने में नाकाम रहा. सेनारी नरसंहार 18 मार्च 1999 को हुआ था जब भू-समाज के 34 किसानों को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया था.उनका अपराध इतना भर था कि वे सवर्ण थे. मामले में आरोपी बनाए गए ज्यादातर लोग भाकपा (माओवादी) से जुड़े थे. इस मामले में कोर्ट 15 नवंबर को दोषियों को सजा सुनाएगी. 
न्यायालय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक अभियुक्तों में गौरी मांझी, व्यास यादव तथा दुखन मांझी को छोड़ शेष सभी अभियुक्त अदालत में उपस्थित थे. इनमें दुखन मांझी को रिहा कर दिया गया.लेकिन वमेश सिंह, मुंगेश्वर सिंह, बुधन यादव, बुटाई यादव, सतेंद्र दास, ललन मांझी, गोपाल साव, दुखित पासवान, करीमन पासवान, गोदाई पासावान, उमा पासवान, विनय पासवान, अरविंद कुमार, …

दैनिक जागरण का खुलासा, सेनारी में भू-महिलाओं का हुआ था अपमान

बिहार के जहानाबाद के सेनारी गाँव में न केवल निहत्थे किसानों की नक्सलियों ने निर्मम हत्या की, बल्कि बाद में भू-महिलाओं का सरकार के इशारे पर पुलिस द्वारा अपमान भी हुआ था. दैनिक जागरण ने अपनी एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है. 
दैनिक जागरण ने अपनी रिपोर्ट में लिखा - 
अरवल जिले के वंशी थाना क्षेत्र के सेनारी गांव के नरसंहार पीड़ितों को पुलिस की ज्यादती का भी शिकार होना पड़ा था। नरसंहार की घटना के एक साल बाद यानि वर्ष 2000 में बड़ी संख्या में पुलिस कर्मी रणवीर सेना समर्थकों को पकड़े जाने के उद्देश्य से सेनारी गांव पहुंचे थे। 
पुलिस टीम का नेतृत्व तत्कालीन डीएसपी संजय रंजन ¨सह कर रहे थे। जब वहां की महिलाओं ने पुलिस कार्रवाई का विरोध किया था तो उनलोगों की बेरहमी के साथ पिटाई की गई थी। पुलिस की पिटाई के कारण दर्जनों महिलाएं जख्मी हो गई थी। सभी जख्मी महिलाओं को स्थानीय सदर अस्पताल में दाखिल कराया गया था। इस घटना को लेकर पूरे देश में बवाल मचा था। इस घटना को न सिर्फ संसद में उठाया गया था बल्कि दिल्ली में पुतला दहन कर इसका पुरजोर विरोध किया गया था। दैनिक जागरण ने इस घटना को प्राथमिकता से प्रकाशित कि…

बहुचर्चित सेनारी नरसंहार मामले में फैसले की घड़ी आज,34 भू-किसानों की हत्या का क्या होगा हिसाब ?

जहानाबाद. सेनारी नरसंहार मामले में आज फैसले की घड़ी है. गौरतलब है कि आज से ठीक 17 साल पहले 18 मार्च 1999 की रात प्रतिबंधित एमसीसी के हथियारबंद उग्रवादियों ने सेनारी गाँव को घेर कर निहत्थे 34 किसानों की गला रेतकर हत्या कर दी थी.
इस मामले में चिंता देवी के बयान पर गांव के चौदह लोगों सहित कुल सत्तर नामजद लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. 
सत्तर आरोपियों में से चार की मौत सुनवाई के दौरान हो चुकी है. 34 का ट्रायल पूरा हो चुका है जिनकी मामले में गिरफ्तारी हो चुकी थी.ये सभी लोग जेल के अंदर बंद हैं. 
इस नरसंहार में मुख्य गवाह चिंता देवी के पति अवध किशोर शर्मा व उनके बेटे मधुकर की भी हत्या कर दी गयी थी.चिंता देवी की तकरीबन पांच वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है. 
मामले में कुल 66लोग गवाह बने थे जिसमें से 32 ने सुनवाई के दौरान गवाही दे दी है. यह हत्याकांड उस वक्त राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री शपथ लेने के ठीक बाद हुई थी.  अब देखने वाली बात है कि क्या फैसला आता है और उस फैसले से मारे गए 34 निहत्थे किसानों के परिवारवालों को इंसाफ मिल पाता है की नहीं?



भूमिहार बाला श्वेता कुमारी सम्मानित

अच्छी खबर : जमशेदपुरी (झारखण्ड) की सुप्रसिद्ध समाजसेवी श्वेता कुमारी को संकल्प नाम की संस्था की तरफ से सम्मानित किया है. उन्हें ये सम्मान समाजसेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया. सम्मान मिलने पर उन्हें भू-मंत्र की तरफ से बहुत बधाई.




मुस्लिमों के लिए अल्पसंख्यक शब्द के प्रयोग पर गिरिराज सिंह को आपत्ति

बिहार से सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक माने जाने वाले गिरिराज सिंह ने मुसलमानों पर फिर एक बार हल्ला बोला है. इस बार उन्होंने उनके अल्पसंख्यक कहे जाने पर आपत्ति दर्ज की है.
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा पर विचार करने की जरूरत है.इंडि‍या में मुस्लिमों की आबादी 20 करोड़ से ज्यादा है. उनकी परिभाषा तय होनी चाहिए. 
गिरीराज सिंह ने कहा, देश के 70 जिलों में मुस्लिमों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है. बिहार के किसनगंज में मुस्लिमों की आबादी 70 से 80 फीसदी है. वहां भी अल्पसंख्यक कैसे कहे जाते हैं और जहां 10 फीसदी हैं वहां भी अल्पसंख्यक हैं.

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