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भूमिहार समाज दलबदलू नेताओं से परेशान





कहावत है कि मेढकों को तराजू में नहीं तौला जा सकता। राजनीति में भी यह कहावत लागू होती है. और बात जब भूमिहार नेताओं की आती है तो यह अक्षरश: साबित होती है. नेताओं में मेढकों की तरह उछल-कूद की प्रवृत्ति से भूमिहार समाज हैरान-परेशान है. ऐसा करने वाले नामों की फेहरिस्त लंबी है. इनमें पूर्व सांसद अरुण कुमार, विधान पार्षद नीरज कुमार, पूर्व मंत्री वीणा शाही, श्यामसुंदर सिंह धीरज, रामजतन सिन्हा, जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा, लालगंज के विधायक मुन्ना शुक्ला एवं पूर्व सांसद सूरजभान आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं.

ताजा मामला जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार का है. वह भी नीतीश कुमार का नेतृत्व कबूल करने के लिए तैयार हो गए हैं, जबकि जदयू द्वारा राज्यसभा में भेजे गए उपेंद्र कुशवाहा ने सवर्णों को काफी भला-बुरा कहा था. पटना में आयोजित जगदेव प्रसाद जयंती समारोह में उपेंद्र कुशवाहा ने सरेआम कहा था कि पिछड़े गालियां बर्दाश्त नहीं करेंगे. यदि कोई पिछड़ों को गाली देगा तो उनके हाथ गाली देने वालों की गर्दनों तक पहुंच जाएंगे. अपने राजनीतिक वनवास के समापन को बेचैन अरुण कुमार समाज के अपमान को भूल गए.

उपेंद्र कुशवाहा का बयान ललन सिंह को केंद्र में रखकर आया था. नीतीश कुमार से ललन के अलगाव का कारण भी उपेंद्र कुशवाहा थे. कांग्रेस में मान-सम्मान मिलने के बावजूद अरुण कुमार दोबारा नीतीश के सिपहसालार बनने को तैयार हो गए, जबकि उनके खिला़फ बाढ़ की अदालत द्वारा सम्मन जारी करने के मामले में शासन ने बतौर साजिशकर्ता अरुण कुमार को लक्षित किया था. पंडारक के ढीबर निवासी रामानंद सिंह के कथित अपहरण के मामले में अरुण कुमार के घर पुलिस का छापा पड़ा था. कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या के मामले के गवाह रामानंद सिंह की बरामदगी भी पुलिस ने अरुण कुमार के आवास से दिखाई थी. 1990 में गया स्नातक क्षेत्र से विधान पार्षद चुने गए अरुण बाद में नीतीश की शरण में गए थे. युवा समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके अरुण बाद में नीतीश से अलग होकर लालू-रामविलास का समर्थन पाकर नालंदा से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोंकने लगे थे. लोजपा में शामिल होकर राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए अरुण 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की शरण में चले गए, क्योंकि राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने अरुण कुमार के लिए जहानाबाद सीट छोड़ने से मना कर दिया था. कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले अरुण अब फिर से समाज को ठगा हुआ महसूस कराकर जद (यू) में लौट चुके हैं. उन्होंने कभी कहा था कि भूमिहार समाज राजनीति में कहार की भूमिका में है और यह बिरादरी पालकी ढोने का काम करती है. नीतीश, लालू, रामविलास और कांग्रेस की पालकी ढोकर उन्होंने अपने बयान को सही ठहराया.


मोकामा के एमएलसी नीरज कुमार का राजनीतिक जीवन भी हनुमान कूद का रहा है. भाकपा के बैनर तले राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले नीरज कांग्रेस, भाजपा, समता पार्टी के रास्ते जद (यू) की राजनीति में सक्रिय हैं. अरुण कुमार जब समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे, तब नीरज उनकी समिति में प्रधान महासचिव थे. अरुण ने जब नीतीश का साथ छोड़ा तो नीरज वर्तमान मुंगेर सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के साथ हो लिए. पटना स्नातक विधान परिषद चुनाव में नीरज के अलावा वेंकटेश उर्फ डब्लू एवं रमेश सिंह प्रमुख दावेदार थे. डब्लू को शिवप्रसन्न यादव की मार्फत शरद यादव का वरदहस्त प्राप्त था और पूर्व एमएलसी अधिवक्ता रमेश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पसंद थे. लेकिन ललन सिंह ने ताक़त लगाकर न स़िर्फ नीरज को उम्मीदवारी दिलाई, बल्कि उनकी जीत भी सुनिश्चित कराई. जब नीतीश कुमार से ललन सिंह की दूरी बढ़ी और ललन ने किसान महापंचायत का झंडा बुलंद किया, तब नीरज किसान रथ लेकर बिहार की सड़कों पर दौड़ने लगे. नीरज के कारनामे को अवसरवादिता की पराकाष्ठा माना गया.

जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा की पलटमारी ने तो सबको हतप्रभ कर दिया. विधानसभा उपचुनावों में पार्टीं लाइन के विपरीत जाकर जगदीश शर्मा ने अपनी पत्नी शांति शर्मा को घोसी से उतारा तो सरकार के निर्देश पर एसटीएफ को उतार दिया गया था. जगदीश शर्मा के समर्थकों की मतदान के दिन चुन-चुनकर पिटाई की गई. जद (यू) से निलंबित होने के बाद किसान महापंचायत के शुरुआती दिनों में समर्थन करने वाले जगदीश शर्मा ने न स़िर्फ खुद को महापंचायत से अलग कर लिया, बल्कि नीतीश कुमार के इशारे पर अब स्वामी सहजानंद किसान महाचौपाल के आयोजन में भी जुटे हैं.

पूर्व मंत्री वीणा शाही ने वर्ष 2000 के विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश की सात दिनी सत्ता के दौरान कहा था कि यदि उनके एक वोट से नीतीश की सरकार बचती है तो वह सरकार बचाएंगी. नीतीश को वोट देने की बात तो दूर, वीणा शाही राबड़ी देवी मंत्रिमंडल में भी बतौर सहकारिता मंत्री शामिल हुईं. वीणा स्व. हेमंत शाही की पत्नी हैं, जिनकी हत्या लालू राज में हुई थी. पूर्व मंत्री श्यामसुंदर सिंह धीरज फिलहाल कांगे्रस में हैं. कांग्रेस के बैनर तले राजनीतिक क्षितिज पर चमकने वाले धीरज बाद में समता पार्टी में गए. नीतीश के साथ साए की तरह चिपक कर रहने वाले धीरज बाद में लालू की शरण में भी गए और फिर थक-हारकर कांग्रेस में वापस आ गए हैं. रामजतन सिन्हा भी दलबदल के लिए चर्चित रहे हैं. कांग्रेस में हमेशा गुटबाजों की अग्रिम पंक्ति में शामिल रहे रामजतन सिन्हा लोजपा के पदाधिकारी बने और फिर बाद में उन्होंने अपना संगठन भी बनाया. वह फिलहाल कांग्रेस में हैं.

लालगंज के विधायक मुन्ना शुक्ला दस वर्षों के राजनीतिक इतिहास में कई बार दल बदल चुके हैं. निर्दलीय चुनाव जीतने वाले मुन्ना बाद में लोजपा में शामिल हुए और फिर जद (यू) में आ गए. फिलहाल वह जी कृष्णैया हत्याकांड में सजायाफ्ता होकर जेल में बंद हैं. मुन्ना राजद की ओर हमेशा टकटकी लगाए रहते थे. पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की स्थिति फिलहाल बेहतर है. समता पार्टी के समर्थन से 2000 में मोकामा से विधायक बने सूरजभान ने तब निर्दलीय विधायक मोर्चा बनाया और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने में सारी ताक़त लगाकर उनके एहसान का बदला चुकाया. लोजपा प्रत्याशी के तौर पर 2004 में बलिया से सांसद बने सूरजभान ने रामविलास का नेतृत्व कबूल किया और अभी तक उनके साथ बने हुए हैं. सूरजभान ने उस वक्त भी रामविलास का साथ नहीं छोड़ा, जब लोजपा में भगदड़ मच गई थी. बात यदि महाचंद्र प्रसाद की करें तो कांग्रेस के खूंटे से बंध कर रहने के बावजूद समाज के लोगों का कभी उन पर विश्वास नहीं रहा.

श्याम सुंदर सिंह धीरज बताते हैं कि समाज में कुछ नेता ऐसे भी हुए हैं, जो मंडल कमीशन का अनावश्यक विरोध कर लालू प्रसाद की राजनीति मजबूत करते रहे. जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे पत्रकार वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि मंडल आयोग का कतिपय लोगों ने ज़रूरत से ज़्यादा विरोध किया और यही कारण है कि अगड़ा-पिछड़ावाद को बढ़ावा मिला और सवर्ण समुदाय राजनीति में हाशिए पर चला गया. विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक पलटमारी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. भूमिहारों के बड़े तबके का मानना है कि नीतीश कुमार की राजनीति जब पिछड़ा-अति पिछड़ा-महादलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे आगे बढ़ेगी तो फिर बिरादरी के नेता क्यों नीतीश का साथ कबूल करने को बेताब हैं. नीतीश से नाराज भूमिहारों का एक बड़ा तबका राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की ओर टकटकी लगाए बैठा है, जो सार्वजनिक सभाओं में खुद को सफल सर्जन बताते हुए नीतीश के पेट में छिपे दांत बाहर निकालने की बात कह रहे हैं. देखना दिलचस्प होगा कि ललन सिंह क्या गुल खिलाते हैं.

चौथी दुनिया से साभार .

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