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Showing posts from March, 2009

स्वामी सहजानंद सरस्वती की तस्वीर

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ शताब्दी समारोह संपन्न

हैदराबाद, 24 मार्च 2009।
साभार : मीडिया ख़बर.कॉम : http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=29&tid=815

इस वर्ष राष्ट्रकवि डॉ। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को हुआ था। उन्हें हिंदी साहित्य में उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि माना जाता है। भावुक राष्ट्रीयता, दार्शनिक चिंतन और कामाध्यात्म से संपन्न उनकी ‘हुंकार’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ जैसी रचनाएँ हिंदी साहित्य की अमिट धरोहर हैं। उनके काव्य नाटक ‘उर्वशी’ को 1972 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ भारत की सामासिक संस्कृति के विकासक्रम की व्याख्या करनेवाला अद्वितीय ग्रंथ है।

देशभर में ‘दिनकर शताब्दी’ के अंतर्गत आयोजित समारोहों की इस कडी में यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में एकदिवसीय साहित्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
आरंभ में संस्थान के आचार्य एवं अध्यक्ष डॉ। ऋषभदेव शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए आवेग, वाग्मिता, आक्रोश, व्यंग्य और सौंदर्यबोध जैसे आयामों की कसौटी पर 'दिनकर' के काव्य के मूल्या…

भूमिहार एकजुट हो देश के विकास में योगदान दें - अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्माण महासंघ

नई दिल्ली। अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्माण महासंघ ने होली के पावन अवसर पर सभी देशवासियों से एकजुट होकर देश के विकास में योगदान देने का आह्वान किया। महासंघ के तत्वाधान में रविवार को स्थानीय पर्यावरण सभागार, भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान में आयोजित होली मिलन समारोह मेंमुख्य अतिथि एवं सांसद जयप्रकाश नारायण सिंह ने कहा कि भूमिहार ब्राह्माणों ने समाज के विकास में अपनी अग्रणी भूमिका निभायी है। उन्होंने भूमिहार ब्राह्माणों की एक निर्देशिका एवं शादी विवाह योग्य वर कन्याओं की सूची प्रकाशित करने की सलाह दी। सिंह ने भूमिहार ब्राह्माणों को एकजुट होकर समाज के विकास में योगदान देने का अनुरोध किया। द ग्लोबल ओपन यूनिवर्सिटी नागालैंड के प्रो। चांसलर डा. प्रिय रंजन त्रिवेदी ने कहा कि भूमिहार ब्राह्माणों को आपसी मतभेद भूलकर देश के विकास के लिए कार्य करने का समय आ गया है। डा. त्रिवेदी ने कहा कि भूमिहार ब्राह्माण ही समाज को हमेशा से नई दिशा देते आ रहे है। जिन दिनो भारत गुलाम था, उन दिनों भी भूमिहार ब्राह्माण एवं इसके समरूप विभिन्न प्रदेशों के अयाचक ब्राह्माणों ने देश के मान-सम्मान और रक्षा के लिए…

Swami Sahajanand Saraswati - Part 2

Swami Sahajanand Saraswati was, of course, a fascinating personality but what also added immense social significance to him was the fact that he was able to found a massive organisation. This took a great deal of both imagination and effort and the fact that it has had a turbulent history is evidence of the role of the individual as well as the relevance of the political-economic context.Although the Bihar Provincial Kisan Sabha was formed in 1929 and a smaller Kisan Sabha had been formed even earlier in Patna district with a formal organisational structure, it really was institutionalised only after a few years. Actually, it is correct to say that the Kisan Sabha never really became an `organisation', but remained a movement [Hauser, 1961:87].But if that is so for the whole of the history of the Sabha, in its first years it was even more nebulous: an idea, a forum, a propaganda platform, a lobby. Almost immediately after the formation of the Sabha Bihar was plunged, with the rest…