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Showing posts from February, 2009

Swami Sahajanand Saraswati - Biography

Swami Sahajanand Saraswati (1889-1950), was born in a Jijhoutia Bhumihar Brahmin family of Gazipur of Uttar Pradesh state of India, was an ascetic (Dandi sanyasi) of Dashnami Order (Dasanami Sannyasi order) of Adi Shankara Sampradaya (a monastic post which only Brahmins can hold) as well as a nationalist and peasant leader of India. Although he was born in Uttar Pradesh (U.P.), his social and political activities centered mostly in Bihar in the initial days, and gradually spread to the rest of India with the formation of All India Kisan Sabha. He had set-up an ashram at Bihta, near Patna and carried out most of his work in the later part of his life from there. He was an intellectual, prolific writer, social reformer and revolutionary all rolled into one.

Government of India had issued a commemorative stamp in the memory of Swami Sahajanand Saraswati, and the stamp was officially released on 26 June 2000 by Ram Vilas Paswan, the-then Minister of Communications, Government of India.

The …

Postage Stamp on Swami Sahajanand Saraswati

Special Postage Stamp on Swami Sahajanand Saraswati released by the Minister of Communications Shri Ram Vilas Paswan in Patna on June 26, 2000।

Politicians Use Sahajanand's Birth Anniversary to Advance Personal Agenda

AgendaPatna: Feb. 23, २००९
COURTSY : Patna Daily
Disgruntled politicians in Patna on Monday, at a function organized supposedly to mark the birth anniversary of Swami Sahajanand Saraswati, took out their anger at Chief Minister Nitish Kumar while portraying themselves as the men of high character and the true well-wishers of the people of Bihar.

After momentary mention of the man supposed to be honored at the function organized at the Sri Krishna Memorial Hall, angry Bharatiya Janata Party (BJP) and Janata Dal (U) leaders, some former, some still in the party, took the NDA administration to task by accusing it of encouraging criminals in the state and forgetting the agenda of development.

Among those who took their anger out in the name of Swami Sahajanand were former Bihar Health Minister Chandramohan Rai, former Transport Minister Ajit Kuamr, and former MLA Janardan Sharma, among others.

The leaders accused the Chief Minister of ignoring the Bhumihar community in Bihar saying Nitish Kuma…

A news related to bhumihaar .

Namaskar,
Hear is a news for our bhumihaar samaj .

dr.sachikant assistant comissioner ,kendriye vidyalaya sanghathan,delhi region now promoted with effect from 2nd jan2009 this year as deputy comissioner.
this is good news for our samaj .।

dr.bimlesh kumar
patna

यह ख़बर हमारे पास बहुत पहले आ गई थी। लेकिन कुछ कारणवश प्रकाशित नही हो पाई थी। इसे अब हम भूमिहार मंत्र पर प्रकाशित कर रहे हैं। आप यदि बधाई संदेश देना चाहते हैं तो bhumiharmantra@gmail.com पर हिन्दी या अंग्रेज़ी किसी भी भाषा में लिख भेजें। यदि आपके पास भी ऐसी कोई सुचना हो हमें लिख भेजिए।

भगवान परशुराम पर किताब

भूमिहार समुदाय के इष्टदेव भगवान परशुराम पर किताब भगवान परशुराम पर सन 1999 में एक किताब छपी थी. किताब का नाम भगवान् परशुराम है और इसे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने लिखा है. इसकी पृष्ठ संख्या 338 है और इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है. किताब की कीमत 5.95 डॉलर रखी गई है. प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश:
आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त में युद्ध और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं जहाँ वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्डव आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएँ आर्यधर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं। लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यवर्त नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित…

भूमिहारों के इष्टदेव भगवान् परशुराम : एक परिचय

परशुराम रामायण काल के दौरान के मुनी थे। पूर्वकाल में कन्नौज नामक नगर में गाधि नामक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु जी ने आकर अपने पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करें और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना।

"इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु जी ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु जी को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री!…

काश! की मैं भूमिहार ना होता (कविता)- अमू.

युवा मन कोमल होता है और देश-काल व् परिस्थिति का उसपर ज्यादा असर होता है.तब वह कई बार अपने आक्रोश को अपने तरीके से प्रकट करता है. कविता एक ऐसा ही माध्यम है. नीचे प्रकाशित कविता भी कुछ ऐसी ही है.एक युवा भूमिहार की किसी खास स्थितयों में लिखी गई कविता जिसमें कुंठा का स्वर उभर कर सामने आता है. हालाँकि हम इससे इत्तेफाक नहीं रखते. कर्म करने पर फल मिलता ही है. बस सूत्रवाक्य है कर्मठता. पढ़िए एक युवा भूमिहार की कुंठा में लिखी कविता - 
भूमिहार…...! काश! की मैं भूमिहार ना होता, तो यूँ जीने को मजबूर ना होता। दसवीं मे पढ़ाई कर करके, ये मोटा सा चश्मा गर लगाया ना होता, तो गर्ल फ्रेंड से यूँ पराया ना होता, काश! की मैं भूमिहार ना होता, कॉलेज अड्मिशन मे धके खा ख़ाके, ये जूता गर मेरा घिस्सा ना होता, तो माँ की आँखों मे यूँ आँसू ना होता, काश! की मैं भूमिहार ना होता, इंटरव्यू मे प्रश्नोतर की जगह, अगर! मैं हरिजन बोला होता, तो अपने पास भी एक जॉब होता, काश! की मैं भूमिहार ना होता, ज़िंदगी मे जब भी ज़रूरत आन पड़ता, हरिजन बनाना तब मुझे भता, गाड़ी,बंगले,नौकर सब मैं पाता, काश! की मैं भूमिहार ना होता, ----अमू।साभार…

भूमिहार समाज को संगठित करने पर बल

Jan 09
साभार - दैनिक जागरण

गया । 'नूरे हक का कोई सिलसिला चाहिए, हर अंधेरे को कोई जलता हुआ दीया चाहिए, हम जीए तो जीए दूसरों के लिए, जिंदगी में यही एक फलाफल चाहिए।' उक्त उद्ेश्य को लेकर भूमिहार समाज को साथ संगठित करने का बीड़ा उठाया है- भूमिहार एकता मंच ने।

मंच के संयोजक धीरेंद्र कुमार ने शुक्रवार को एक होटल में प्रेस वार्ता में कहा कि समाज का गौरवशाली इतिहास रहा है। इस इतिहास को पुनर्जीवित करने के उद्ेश्य से आगामी 8 फरवरी को स्थानीय आजाद पार्क में भूमिहार समाज का एक ऐतिहासिक सम्मेलन का आयोजन किया गया है। जिसमें राजनीतिक दल से ऊपर उठकर भारत सरकार एवं बिहार सरकार के मंत्रिमण्डल में शामिल भूमिहार समाज के कर्णधार मंच के सम्मेलन में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि 15 साल तक बिहार इस समाज नें संघर्ष किया था। 'कुशासन' से मुक्ति दिलाने में इस समाज का योगदान रहा है।

मंच के नेताओं ने समाज के सामने छह सूत्री उद्ेश्य को रखा है। भगवान परशुराम के नाम प्रत्येक जिले में आश्रम की स्थापना करना, स्वामी सहजानंद के नाम से ट्रस्ट बनाना, सर गणेश दत्त के नाम पर जिले में +2 आवासीय विद्यालय की स्थापना क…

अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि महासम्मेलन के लिए लिखित रामधारी सिंह दिनकर की एक विलुप्त कविता

सन 1938 में पटना में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि महासम्मेलन क आयोजन किया गया था जिसमें काशी नरेश विभूति नारायण सिंह, सर गणेश दत्त, बाबू रज्जनधारी सिंह आदि गणमान्य लोग मौज़ूद थे। दिनकर जी ने उस महाजाति सम्मेलन के लिए यह कविता लिख भेजी थी जिसे उसमें स्वागत-गान के रूप में पढ़ा गया था। कविता कोश के सहयोगी पश्चिमी सिंहभूम, झारखण्ड के निवासी श्री रवि रंजन ने बाबू रज्जनधारी सिंह के गाँव 'भरतपुरा' में बने उनके निजी पुस्तकालय से यह कविता उनकी नोटबुक से ढूँढ निकाली है। इस कविता का कोई शीर्षक नहीं दिया गया है।-------------------------------------------------------------------------------------बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें,आज क्या है कि देख कौम को गम है।कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है?भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में?कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती तुम्हें शरम है?आग लगे उस धन में जो दुखियों के काम न आए,लाख लानत जिनका, फटता नही मरम है।दुह-दुह कर जाति गाय की निजतन धन तुम पा लोदो बूँद आँसू न उनको यह भी कोई धरम है?देख रही है राह …

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : एक महान भूमिहार : एक परिचय

मनुष्य पर जब विपत्ति आती है, उसे और .....

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म बिहार प्रदेश के बेगूसराय (पुराने मुंगेर) जिले के सिमरिया गांव में एक निम्न मध्यवर्गीय भूमिहार ब्राह्मण किसान परिवार में 23 सिंतबर 1908 को हुआ था। यह ग्राम पुण्यतोया गंगा नदी के पावन उत्तरी तट पर बसा हुआ है। और मिथिलाचंल का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां पूरे उत्तर बिहार समेत नेपाल से तीर्थ यात्री बड़ी संख्या में आते हैं और प्रति वर्ष कार्तिक माह कल्पवास चलता है। किंवदंती यह है कि विवाहोपरांत सीता को विदा कराकर ले जाते समय राम ने इसी स्थान पर गंगा को पार किया था। तभी से यह स्थान सिमरियाघाट के नाम से प्रसद्धि है। इस नाम में से ‘म’ और ’रि’ को हटा दें तो वह ‘सियाघाट’ हो जाता है। दिनकर जी के पिता का नाम बाबू रविराय (रविसिंह) था और पितामह का नाम शंकर राय था। इनके वंश में भैरवराय नामक एक कवि भी थे जिनकी ब्रजभाषा में लिखित पोथी ‘नगर-विलाप’ है। दिनकर जी की माता का नाम मनरूप देवी था। उस जमाने में सिमरिया गांव के घर–घर में नित्य ‘रामचरितमानस’ का पाठ होता था। उनके पिता जी अपने समाज में मानस के मर्मज्ञ समझे जाते थे और लोगों का…

राष्ट्रकवि 'दिनकर' ने सबसे पहले पहले प्रयोग किया था 'दलित' शब्द

दलित के नाम पर रोटी और बोटी खाने वाले बौद्धिक वामपंथी और छद्म प्रगतिशील ये भूल जाते हैं कि 'दलित' शब्द के पहले प्रयोगकर्ता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर थे और दिनकर जी कौन थे ये बताने की जरूरत है क्या? ये बात भूमंत्र नहीं,बल्की नामचीन साहित्यकारों का कहना है.पढ़िए पूरी रिपोर्ट-

कबीर जैसी दृष्टि और तुलसी जैसी भावाभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता वाले हिन्दी के शीर्षस्थ कवि रामधारीसिंह दिनकर के काव्य में प्रखरता मार्मिकता और जनता की बदहाली के प्रति हाहाकार नजर आता है। वे साहित्य में दलित शब्द का प्रयोग करने वाले पहले लेखक थे।राजधानी में रामधारी सिंह दिनकर जन्मशती संगोष्ठी पर 'दिनकर की आवाज का वैशिष्ट्य' विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ कवि और संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने ये एक बार कहा था कि हर वक्त का महत्वपूर्ण कवि प्रतिरोध करता है और दिनकर ने भी परंपरा को सिरे से खारिज करने का प्रतिरोध किया। उन्होंने दिनकर को आखिरी बड़ा कवि बताते हुए कहा कि उस दौर में जब साहित्य में लघुता और सामान्यता का बोध अधिक था। ऐसे में दिनकर के काव्य में विराटता और महात्वाकांक्षा झलकती है।

उन्हों…

रश्मिरथी को पाठ्यक्रम में शामिल करे सरकार

Feb 08, 12:05 am
साभार - दैनिक जागरण
पटना [जागरण ब्यूरो]। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कृति रश्मिरथी को पुन: पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग बिहार सरकार से की है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के लिए दुर्भाग्य की बात है कि दिनकर जी की कृति 'रश्मिरथी' को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। उन्होंने कहा दिनकर जी को भारत रत्न मिलना चाहिए। इसकी लड़ाई वह खुद लड़ेंगे।
सिमरिया में दिनकर की स्मृति के लिए उन्होंने केंद्रीय पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी से भी बात है। पासवान ने कहा कि हम अपने अतीत व गौरव को भूल गए हैं। राष्ट्रकवि दिनकर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वह धारा के विपरीत होकर चले। उन्हें समझने के लिए दिल और दिमाग दोनों चाहिए।
स्व दिनकार का संसद में तैल चित्र लगवाने पर केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान शनिवार को सम्मानित किए गए। सम्मान समारोह में दिनकर के पुत्र केदार बाबू भी मौजूद थे। स्कूली छात्र-छात्राओं ने दिनकर की रचनाओं पर आधारित गायन व अभिनय का कार्यक्रम प्रस्तुत किया।

शरद पवार का मोतिहारी और उसके आस-पास के क्षेत्र का दौरा/ साथ में लालू यादव (2008)

सहजानंद सरस्वती की 120 वीं जयंती पर 23 को होगा जुटान

साभार - दैनिक जागरण
सहजानंद सरस्वती की 120 वीं जयंती पर 23 को होगा जुटान
Feb 14, 10:57 pm
पटना स्वामी सहजानंद सरस्वती की 120 वीं जयंती के मौके पर 23 फरवरी को स्थानीय एसके मेमोरियल हाल में होने वाले कार्यक्रम कई राज्यों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। हिमाचल प्रदेश, हरियाणा व दिल्ली के विधायक भी मौजूद रहेंगे। पूर्व मंत्री अजीत कुमार व चंद्रमोहन राय के नेतृत्व में जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। जयंती समारोह की तैयारी को ले शनिवार को पूर्व मंत्री अजीत कुमार के आवास पर तैयारी समिति की बैठक हुई। श्री कुमार ने बताया कि कार्यक्रम में एयर चीफ मार्शल एस पी त्यागी, हरियाणा की कृष्णा पंडित, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मंत्री व विधायक जी एस बाली, दिल्ली के विधायक महाबल मिश्र व पवन हंस हेलीकाप्टर के सीएमडी आर के त्यागी भी कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। 21 व 22 फरवरी को इसके लिए राजधानी में जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा।लिंक : सहजानंद सरस्वती की 120 वीं जयंती पर 23 को होगा जुटान

आमंत्रण पत्र

Bhumihar- The Warrior Brahmins

Bhumihar- The Warrior Brahmins
Courtsy - http://rakesh.in/
Bhumihars are known as Babhan. They are a community of Brahmins who have taken up Land and given up (TYAGI) priest craft (begging and doing Karmakand) even though there are few karmakandi Bhumihar brahmins in Hazaribagh Gaya, Patna & Benaras. They are spread from Afghanistan, Punjab, Maharastra, Gujrat, Kerala to Bihar. In Punjab they were known as Mohiyals, Chitapavan, Anavil, Havyak, Niyogi, Barendro but they claim descent from Lord Parshuram.
Actually Lord Parshuram was the first Brahmin in History to wear arms and to teach lessons to the Kings and bring them to justice. He also seized their land and handed over to Brahmins. The same brahmins are known as Bhumihar brahmins.
Bhujbal bhumi bhup binu kinhi,bipul bar maheedevan dinhee.
(Ram-Charit-Manas)
The word Bhumihar derives its name from sanskrit word “Bhumi�? meaning land and Hara meaning maker. Earlier ethnographic accounts [Risley, Crooke1896] contain a large number of …